-रीवा सिंह
कौन कितने कपड़े पहनता है इस पर आपत्ति नहीं की जानी चाहिए। ये किसी भी व्यक्ति का बहुत ही व्यक्तिगत मामला होता है। आपको कोई अच्छा, सभ्य, संस्कारी, वेस्टर्न या मॉडर्न दिखे, इसके लिए वह कपड़े नहीं पहनता। हर इंसान चाहता है कि वह अपनी काया को अपने अनुरूप रखे, सजाए, संवारे। लड़कियों को बैकलेस टॉप्स में सराहने वालों को लड़कों का बनियान पहनकर या बिना कुछ पहने घूमना नहीं अखरना चाहिए। लड़कों को छुट्टा सांड की तरह घूमने की इजाज़त देने वालों को लड़कियों के शॉर्ट्स नहीं नापने चाहिए।
तो कुल-मिलाकर इतना ही कहने की कोशिश है कि अपने शरीर पर उस सीमा तक अपना हक होना चाहिए जितना कि अपने शरीर की आत्मा पर होता है। इसके लिए किसी को किसी भी आधार पर बाध्य करना नैतिक लोकतंत्र की क्षति है।
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वस्त्र के अलावा अगर दूसरे परिप्रेक्ष्य में देखें तो तरुण सागर जी ने कुछ भी अच्छा नहीं कहा। वो जिस तरह का उपदेश देने गए थे, उसके लिए विधानसभा उचित स्थान नहीं था। उन्हें अपना पंडाल लगवाना चाहिए था, जहां उनके नेता-भक्त आते और उनका महिमा-मंडन करते। संसद के हर अंग को लोकतंत्र का मंदिर माना जाता है। मुझे तो यह लगता है कि मंदिर ही क्यों माना जाए, आप अच्छाई और आदर्श का कोई दूसरा नाम भी ढूंढ लें। ख़ैर, मंदिर में जब हमारे चुने गए तथाकथित प्रतिनिधि किसी धर्मगुरू के शिष्य बने नज़र आएं तो राज्य की उत्पत्ति में विकास का पहिया सदियों पीछे जाता नज़र आता है और राज्य लोकतंत्र की इकाई न लगकर, किसी दैवीय उत्पत्ति का उदाहरण नज़र आता है। हम अपने विधायकों को विधानसभा में ऐसे प्रवचन सुनते देखते हैं तो नैतिक भावनाएं हिलोरे नहीं मारतीं, हमें लगता है कि आने वाले 5 वर्ष खराब हो गए।
तरुण सागर जी ने अपनी कठोर वाणी में बहुत ही कठोर बातें कही हैं। उनकी बातें सुनकर एहसास हुआ कि राजनीति पढ़ाने के लिए उदाहरणों की वाकई कमी हो चली है। परम महान स्वामी जी ने कहा कि -
राजनीति पर धर्म का अंकुश होना ज़रूरी है। धर्म पति है और राजनीति पत्नी। हर पति का यह कर्तव्य है कि वह अपनी पत्नी का रक्षा करे। हर पत्नी का धर्म होता है कि वह अपने पति के अनुशासन को स्वीकार करे। यदि राजनीति पर धर्म का अंकुश नहीं होगा तो वह मस्त-मगन हाथी की तरह हो जाती है।
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जिस देश की विधानसभा में ऐसे प्रवचन और इस तरह के उदाहरण दिये जा रहे हों वहां मोदी जी आजीवन "बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ" जैसे अभियान चलाते रह जाएं, बेटियों का कुछ भला न हो पाएगा। महात्मा जी को ये समझने में पता नहीं कितने दिन और लगेंगे कि राजनीति और धर्म को अलग रखना बहुत ज़रूरी है। ये बात अगर इन्हें समझ आ गई तो इनकी दाल-रोटी कैसे चलेगी। पति कोई सिक्योरिटी गार्ड नहीं होता और पत्नी तिजोरी का खज़ाना नहीं होती। दोनों को एक-दूसरे की मदद और सहारे की ज़रूरत होती है। पत्नी सिर्फ़ ज़िम्मेदारी नहीं है, वह ज़िम्मेदार भी है। पति-पत्नी का परस्पर संबंध जब तक इनके अनुसार चलेगा तब तक लड़कियों के हाथों में प्लास्टिक की गुड़िया पकड़ाई जाएगी और लड़कों को बंदूक मिलेगी। इनके प्रवचन की चाशनी से निकाली गई लड़कियां कभी किचन से बाहर नहीं निकल पाएंगी। उसके बाद आप घरेलू हिंसा विरोधी कानून बना लें या संसद में 33% आरक्षण ले लें, औरतें हर काम के लिए अपने पति का मुंह निहारेंगी।
आदमी आधी रात को शराब पीकर अपनी बीवी को पीटेगा और पड़ोसी ये सोचकर कुछ नहीं कहेंगे कि उसका पति ही तो मार रहा है। तो पति को मारने-पीटने का लाइसेंस मिल जाएगा। पति अंकुश लगाएगा क्योंकि सुरक्षा देता है। गुरु जी, शुक्र है आपके प्रवचनों से भारतवर्ष नहीं चलता है। आप जो बोलते हैं उसे प्रवचन कहते हैं तो निश्चय ही प्रवचन की परिभाषा बदली जानी चाहिए। [अगर आप भी लिखना चाहते हैं कोई ऐसी चिट्ठी, जिसे दूसरों तक पहुंचना चाहिए, तो हमें लिख भेजें- merekhatt@gmail.com. हमसे फेसबुक, ट्विटर और गूगलप्लस पर भी जुड़ें]