- विनोद कुमार
प्रिय दोस्तों,
आजकल पत्रकारों के साथ जो हो रहा है, वह काफी भय पूर्ण और शर्मनाक है. पत्रकारों को किसी न किसी तरीके से चुप करा दिया जा रहा है. कभी पैसे देकर, कभी डरा-धमका कर, तो कभी झूठे केस मे फंसाकर. पत्रकार अपनी कलम का इस्तेमाल समाज के सुनहरे भविष्य के लिए करता है, लेकिन उसको क्या मिलता है? कभी किसी ने सोचा? नहीं सोचा होगा क्योंकि उनको इस बात से कोई लेना-देना नहीं है कि पत्रकार किस दौर से गुजर रहे हैं? उनको पत्रकार तब याद आते हैं, जब वो शासन या प्रशासन द्वारा सताये जाते हैं. तब उन्हें पत्रकार ही आखिरी उम्मीद के रूप में नज़र आते हैं.
पत्रकारों की तरफ उम्मीद से देखने वाला यही समाज कभी उनके लिए आवाज नहीं उठाता. हमेशा मौन रहता है. मानो जैसे यह समाज पूर्ण स्वार्थी हो. हाल ही में विनोद वर्मा नाम के पत्रकार को उनके आवास से रात करीब 3 बजे पुलिस ने गिरफ्तार किया. क्या कारण था जो इतनी रात को गिरफ़्तारी हुई? क्या विनोद वर्मा कोई आतंकवादी था? या कोई बड़ा दंगाई था? नहीं वो इनमे से कुछ नहीं था. वो सिर्फ एक पत्रकार था, जिसकी कलम की ताकत ने सरकार के एक मंत्री के मन में डर बैठा रखा था. मंत्री को अपनी कुर्सी जाने का ख़तरा था, इसलिए ऐसे पैतरों का इस्तेमाल किया गया.
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जब मैंने यह खबर सुनी तो दिल बैठ गया. डर लगने लगा, मन चिंतित हो उठा और यह सोचने को मजबूर हो गया कि परिवार से लड़कर अलग होकर पत्रकार बनने का जो फैसला लिया था मैंने, अब वो फैसला कहीं ना कहीं गलत होता दिख रहा है. पत्रकार के साथ जिस तरीके से पुलिस का इस्तेमाल किया, वो काफी डराने वाला है. जहाँ तक मेरा मानना है गिरफ्तारी कोर्ट के आदेश से होनी चाहिए थी और गिरफ्तारी से पहले एक निष्पक्ष जाँच होकर उसकी रिपोर्ट कोर्ट में जमा होती, तब जज महोदय अपने विवेक और साक्ष्यों के आधार पर फैसला करते, लेकिन वास्तविकता इसके उलट थी. जाँच के नाम पर पुलिस गिरफ्तार कर लेती है. यह कहाँ का न्याय है?
लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहीं न कहीं डगमगाने लगा है. यह जो कृत्य हुआ है, वह लोकतंत्र पर चोट है. जिसकी भरपाई किसी भी रूप में नहीं हो सकती. अगर पत्रकार गलती करता है तो उसे भी सजा मिले लेकिन पहले सिद्ध तो करें कि वो गलत है.
99% स्टिंग के केसों में मैंने देखा है कि जिस किसी का पत्रकार स्टिंग करते हैं, अगर उसे इस बात की भनक लग जाए तो वह सबसे पहले उस पत्रकार के खिलाफ रंगदारी, उगाही, ब्लैकमेल, डराने-धमकाने और जान से मरने की धमकी की शिकायत दर्ज कराता है, ताकि उसका स्टिंग पत्रकार के ख़िलाफ़ इस्तेमाल किया जाये और होता भी यही है. जाँच के नाम पर वो स्टिंग पुलिस को मिल जाता है.
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देश की न्याय व्यवस्था ऐसी है कि हर केस को आठ दस साल तो आसानी से खिंच जाते हैं. मैं कभी किसी दोषी का समर्थन नहीं करता और ना ही सरकार का समर्थन या विरोध करता हूँ. मैं एक पत्रकार होने के नाते सरकार की ग़लत नीतियों का विरोध व सही नीतियों का समर्थन करता हूँ. समाज को भी मेरी तरह इस मुद्दे पर चिंता करने की जरूरत है. मैं देश की जनता को बता दूँ कि आप सिर्फ और सिर्फ पत्रकारों के कारण ही खुली हवा में साँस ले रहे हैं. अगर सभी पत्रकारों की कलम रुक गयी तो ये नेता देश बेच देंगे और आपको पता भी नहीं चलेगा. अगर किसी नेता को किसी का डर होता है तो वो सिर्फ और सिर्फ पत्रकार से, वरना पुलिस प्रशासन से लेकर …… सब उनकी जेब में होते हैं.
यह लोकतंत्र तब तक जिन्दा रहेगा जब तक पत्रकारों की कलम चल रही है. इसलिए आप लोगों को पत्रकारों के समर्थन में खड़ा होना चाहिए, जब वो आपकी आवाज बनते हैं तो आपको भी तो पत्रकारों की आवाज बनना चाहिए. मैं मानता हूँ कुछ पत्रकारों के कारण यह क्षेत्र थोड़ा दूषित हुआ है, लेकिन अभी भी अच्छे पत्रकार हैं जो आपके लिए हमेशा खड़े होते हैं. समाज को Independent Journalism को बढ़ावा देना चाहिए, ताकि पत्रकारिता हमेशा स्वतंत्र रहे, जिन्दा रहे.
एक बात हमेशा याद रखें. लोकतंत्र सिर्फ और सिर्फ पत्रकारिता पर टिका है. इसको झुकने मत देना, वरना लोकतंत्र की कब मौत हो जायेगी, आपको पता भी नहीं चलेगा.
आपका
विनोद
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प्रिय दोस्तों,
आजकल पत्रकारों के साथ जो हो रहा है, वह काफी भय पूर्ण और शर्मनाक है. पत्रकारों को किसी न किसी तरीके से चुप करा दिया जा रहा है. कभी पैसे देकर, कभी डरा-धमका कर, तो कभी झूठे केस मे फंसाकर. पत्रकार अपनी कलम का इस्तेमाल समाज के सुनहरे भविष्य के लिए करता है, लेकिन उसको क्या मिलता है? कभी किसी ने सोचा? नहीं सोचा होगा क्योंकि उनको इस बात से कोई लेना-देना नहीं है कि पत्रकार किस दौर से गुजर रहे हैं? उनको पत्रकार तब याद आते हैं, जब वो शासन या प्रशासन द्वारा सताये जाते हैं. तब उन्हें पत्रकार ही आखिरी उम्मीद के रूप में नज़र आते हैं.
पत्रकारों की तरफ उम्मीद से देखने वाला यही समाज कभी उनके लिए आवाज नहीं उठाता. हमेशा मौन रहता है. मानो जैसे यह समाज पूर्ण स्वार्थी हो. हाल ही में विनोद वर्मा नाम के पत्रकार को उनके आवास से रात करीब 3 बजे पुलिस ने गिरफ्तार किया. क्या कारण था जो इतनी रात को गिरफ़्तारी हुई? क्या विनोद वर्मा कोई आतंकवादी था? या कोई बड़ा दंगाई था? नहीं वो इनमे से कुछ नहीं था. वो सिर्फ एक पत्रकार था, जिसकी कलम की ताकत ने सरकार के एक मंत्री के मन में डर बैठा रखा था. मंत्री को अपनी कुर्सी जाने का ख़तरा था, इसलिए ऐसे पैतरों का इस्तेमाल किया गया.
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लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहीं न कहीं डगमगाने लगा है. यह जो कृत्य हुआ है, वह लोकतंत्र पर चोट है. जिसकी भरपाई किसी भी रूप में नहीं हो सकती. अगर पत्रकार गलती करता है तो उसे भी सजा मिले लेकिन पहले सिद्ध तो करें कि वो गलत है.
99% स्टिंग के केसों में मैंने देखा है कि जिस किसी का पत्रकार स्टिंग करते हैं, अगर उसे इस बात की भनक लग जाए तो वह सबसे पहले उस पत्रकार के खिलाफ रंगदारी, उगाही, ब्लैकमेल, डराने-धमकाने और जान से मरने की धमकी की शिकायत दर्ज कराता है, ताकि उसका स्टिंग पत्रकार के ख़िलाफ़ इस्तेमाल किया जाये और होता भी यही है. जाँच के नाम पर वो स्टिंग पुलिस को मिल जाता है.
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यह लोकतंत्र तब तक जिन्दा रहेगा जब तक पत्रकारों की कलम चल रही है. इसलिए आप लोगों को पत्रकारों के समर्थन में खड़ा होना चाहिए, जब वो आपकी आवाज बनते हैं तो आपको भी तो पत्रकारों की आवाज बनना चाहिए. मैं मानता हूँ कुछ पत्रकारों के कारण यह क्षेत्र थोड़ा दूषित हुआ है, लेकिन अभी भी अच्छे पत्रकार हैं जो आपके लिए हमेशा खड़े होते हैं. समाज को Independent Journalism को बढ़ावा देना चाहिए, ताकि पत्रकारिता हमेशा स्वतंत्र रहे, जिन्दा रहे.
एक बात हमेशा याद रखें. लोकतंत्र सिर्फ और सिर्फ पत्रकारिता पर टिका है. इसको झुकने मत देना, वरना लोकतंत्र की कब मौत हो जायेगी, आपको पता भी नहीं चलेगा.
आपका
विनोद
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