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नोटबंदी: अरे साहब थोड़ी राष्ट्रभक्ति दिखाइये, चार दिन दवाएं नहीं खायेंगे तो मर नहीं जायेंगे !

-ब्रजेश राजपूत
उस दिन रात को दफ्तर का काम खत्म कर आम दिनों के लिहाज से थोड़ा देरी से घर लौटा था। साढ़े आठ या नौ बजने को थे कि दफ्तर का फोन बजा। फोन उठाते ही बदहवासी के आलम में निर्देश मिलने शुरू हो गये। कहां हैं आप। घर। आप तुरंत निकलिये। भोपाल में किसी भी बैंक के एटीएम या किसी भी जगह से जनता का रियेक्शन भिजवाइये। फटाफट। मगर भाई हो क्या गया। 

अरे आपको नहीं मालूम। टीवी खोलिये। मोदी जी का संदेश सुनिये। आपके जेब और घर में रखे नोट नोट नहीं रह गये। फिर। कागज हो गये हैं कागज। पांच सौ और हजार के नोट बंद हो रहे हैं। बकवास कर रहे हो यार। अरे नहीं आप जरा टीवी तो खोलिये। बस फिर क्या था टीवी पर पीएम मोदी जी थे जो कह रहे थे भाईयों और बहनों आज रात बारह बजे के बाद से पांच सौ और हजार के नोट अब लीगल टेंडर नहीं रहेंगे। मेरे मुंह से निकला अरे क्या हो रहा है ये। खैर तुरंत अपने डाईवर राहुल और कैमरा साथी होमेंद्र से कहा यार जरा जल्दी आफिस पहुंचो इमरजेंसी है। 

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उधर मैं अपने टू व्हीलर से दफ्तर की ओर निकल पड़ा था। मगर रास्ते भर यही सोचता रहा ये मोदी जी कर क्या रहे हैं। क्यों कर रहे हैं। चलते हुये जो थोडे बहुत उनको सुन पाया था उसके मुताबिक वो कह रहे थे ये नोटबंदी आतंकवाद पर प्रहार है। कालाबाजारियों पर चोट है। भोपाल के एमपी नगर में दफ्तर के नीचे ही बैंक का एटीएम है और वहां बदहवासी का आलम दिखने लगा था। लोग अपनी गाडियों से भाग-भाग कर आ रहे थे। हमेशा खाली पड़े रहने वाले एटीएम पर लाइनें लगनी शुरू हो गयीं थीं। 



वहां आये एक शख्स से मैंने पूछा आपको मालूम है हमारे पीएम का कहना है ये आतंकवाद के खिलाफ उठाया गया कदम है? वो आदमी थोडी देर ठिठका फिर हंस कर कहा भैया फिलहाल तो हम ही आतंक का शिकार हो गये हैं। आने वाले दिनों में मालूम नहीं क्या होगा। वो दिन है और आज 30 दिन होने को हैं और हम टीवी के रिपोर्टर रोज एटीएम की लाइनें ही कवर कर रहे हैं। शहर गांव और रेलगाडी में देखे कुछ दिलचस्प सीन आप भी देखें। 

सीन एक। भोपाल में बैंक के सामने लंबी कतार लगी है। बैंक खुला नहीं है। धक्का मुक्की हो रही है। कतार में खडी है सुशीला शर्मा। पैंसठ साल की उमर मगर माइक देखते ही बोलीं बहुत अच्छा हुआ। अब अमीर नोटों की गड्डियों पर सो नहीं पायेंगे। मैंने पूछा आपने किसी को नोटों पर सोते देखा है वो बोली अरे भैया सब सुना है हमने भी। अचानक बैंक का दरवाजा खुला और वो लड़खडाकर गिरने से बचतीं हुयीं किसी तरह अंदर हुयीं।


सीन दो। बैंक की कतार में खड़े हैं भेल से रिटायर्ड आरव्ही राव। हमें देखकर कहते हैं हार्ट का मरीज हूं, हर महीने दवाओं में ही पांच दस हजार खर्च हो जाते हैं। नोटों की इस किल्लत और बैंकों से पैसे निकालने की बंदिश ने बहुत परेशानी पैदा कर दी है। उनकी कहानी पूरी सुन भी नहीं पाता कि पीछे से आये एक सज्जन शुरू हो जाते हैं, अरे साहब थोड़ी राष्ट्रभक्ति दिखाइये। चार दिन दवाएं नहीं खायेंगे तो मर नहीं जायेंगे। आप पढ़े लिखे हैं। आपको ऐसी बातें नहीं बोलनी चाहिये। मोदी जी ने ऐतिहासिक काम किया है।

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सीन तीन। भोपाल के पास चंदेरी गांव के किसान एमएस मेवाड़ ने हमें गांव में बुलाया है। छूटते ही बोले अरे साहब हमारी छोड़िये हम तो किसान हैं, भूखें नहीं मरेंगे। रही बीज खाद के लिये पैसों की दिक्क्त तो झेल लेंगे मगर हरिजन बस्ती में चलिये साहब, जहां एक हफ्ते से आदमी औरतें काम पर नहीं गये। उनकी खबर दिखाओ आप। उस बस्ती की रामकली कहती है काम मिलना बंद है और घर पर रखा है बचत के नाम पर यही एक पांच सौ का नोट है। समझ नहीं आता इसे कैसे खर्च करें। भैया कितने दिन तक चलेगा ये नोटबंदी। एक हफ्ते में सब ठीक हो जायेगा ना?


सीन चार। भोपाल के बिट्टन मार्केट की सबसे बडी मोबाइल शाप के मालिक कैलाश वाधवानी बताते हैं शुरूआत के चार दिन जब गल्ले में एक भी पैसा नही आया तो हाथ पैर फूल गये। एक भी मोबाइल नहीं बिका। अब कंपनियों ने जीरो परसेंट फाइनेंस शुरू किया है तो दिन में बीस से तीस मोबाइल बेचने वाले हम पांच से आठ मोबाइल बिकने को ही अब अच्छी बिक्री मान रहे हैं। महंगे मोबाइल की ब्रिकी तो एकदम ठहर ही गयी है।

सीन पांच। दक्षिण एक्सप्रेस में हमने चौपाल सजायी है। माइक लगाते ही हैदराबादी हिंदी में शुरू हो गये रहमत अली। हमने बैंकां के लाइन के बाजू कोई अमीरां आदमी तो नहीं दिखा। फिर कैसा अमीरां पर चोट हुआ समझा नक्को। खाना देने वाला वेडर सोहन बोला जब से ये नोटों का लफड़ा हुआ है लोगों ने गाड़ी में खाना कम कर दिया। या तो हमें देने पैसा नहीं है और है तो दो हजार का नोट। आप बताओ इस दो हजार का छुटटा हम कहां से देंगें।

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सीन छह। भोपाल के सात नंबर मार्केट के सबसे ज्यादा भीड़ वाले रेस्तरां सागर गैरे के मालिक उदास बैठे हैं। कुछ दिनों पहले ही मार्केट में आसपास की दुकानेें खरीद कर रेस्तरां के लिये जगह बढ़ायी थी। अब उन्हीं जगह लगायी हुयी खाली टेबल कुर्सी को देखकर कहते हैं लोग आ ही नहीं रहे। पिछले कुछ सालों में ही तो लोगोें ने बाहर आकर खाने की आदत डाली थी अब 8 फीसदी रह गयी ब्रिकी के कारण आधे स्टाफ़ को निकालना होगा। नींद उड़ी है हमारी। 


ये सारे सीन तारीखों के बढ़ते क्रम में हैं। यानी कि आठ नवंबर से लेकर तीन दिसंबर तक। हम रिपोर्टर हैं जनता के बीच ये सारी बातें सुनते हैं और इनको बिना लाग लपेट के जनता के सामने पेश करते हैं। इस पूरे महीने नोटबंदी की ढेर सारी बातें सुनने और पढ़ने के बीच जो बात ज्यादा जंची वो अभिनेता अनुपम खेर की रही। आरएसएस के किसी संगठन के कार्यक्रम में भोपाल आये अनुपम ने नोटबंदी के सवालों की बौछार के बीच कहा पीएम मोदी का ये फैसला जैसा भी हो अभी तो हमें साथ देना है। ये अच्छा है या बुरा इसका फैसला 2019 के चुनावों में जनता करेगी। उम्मीद है तात्कालिक छोटी बड़ी परेशानियों को भूलकर आप भी अनुपम से सहमत होंगे। 
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