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मेरी पुस्तक का विमोचन, आह! फोटो खिंचवाकर इतनी संतुष्टि मिली कि क्या बताऊँ

- सुनीता पांडेय

प्रिय डायरी, 
आज तुम्हें अपने मन की सच्ची बात  बताती हूँ. मेरी साध बताने जा रही हूँ तुम्हें. प्लीज़ तुम किसी को मत बताना. बच्चे बड़े हो गए थे मेरे. अब मेरे पास समय खूब था. मैंने फेसबुक जॉइन कर लिया. कई सारे फ्रेंड्स बनाए ताबड़तोड़. खूब सारी फ्रेंड रिक्वेस्ट भी आतीं तो लगा कि अपन भी कुछ हैं. हिन्दी में शुरू से ही रूचि थी, मेरी सी हिन्दी वालों को पढ़ने लगी थी. फिर सोचा कि थोड़ा बहुत तो मैं भी लिख सकती हूँ. सो शुरू कर  दिया लिखना.

अब चूंकि थोड़ा बहुत लिखना शुरू कर दिया  तो दोस्त लोग सराहने लगे थे. कोई कहता मुझे तुम मे अमृता प्रीतम नज़र आती है तो कि कोई कहता की तुम मे महादेवी की झलक है. मैं फूल कर पूरी की तरह हो जाती और फिर दुगुने उत्साह से नई कविता लिख डालती. फेसबुक पर जैसे ही उसे परोसती कि सैंकड़ों लाइक्स आते दसियों कमेंट्स आते वाहवाही के. फिर लोगों ने कहना शुरू किया कि अपनी किताब क्यूँ नहीं छपवाती हो? अरे अब तो तुम्हें प्रिंट में आ ही जाना चाहिए.

सोचा सब कहते हैं तो कोई तो बात होगी ही मुझमें. तभी किसी एक प्रकाशक का मेसेज आया मुझे. अपनी जेब से सिर्फ 25-30 हज़ार खर्च कर के मैंने भी मेरा कविता संग्रह छपवा लिया. चूंकि पुस्तक मेला नजदीक आ रहा था सो सोचा कि विमोचन तो तब ही करूंगी. साहित्य के सभी महारथी मेरी फ्रेंड लिस्ट में थे ही, सो किसी एक को चुनने की समस्या आन खड़ी हुई. एक से करवाऊँ तो दूसरे के नाराज़ होने का डर. कहीं नाराज़ हो गए और अपनी पत्रिका में मुझे स्थान नहीं दिया तो? पर फिर भी मित्रों से मंत्रणा कर जो सबसे सस्ते में बैठ गए उन्हें ही बुक कर लिया.

विरेचन का...ऊप्स, विमोचन का दिन नजदीक आ रहा था और सबसे बड़ी समस्या जो मुंह बाए खड़ी थी वह यह कि साड़ी कौनसी पहनूँ? अब फिर पकड़ा पति महोदय को. उनसे मान मनौव्वल कर एक बढ़िया वाली साढ़े चार हज़ार रुपये की साड़ी खरीदी ज़री के बॉर्डर वाली और दो हज़ार रुपये की उस से  मैचिंग की ज्वैलरी खरीदी और हाँ बस पंद्रह सौ रुपये की सैंडल भी खरीदे. विमोचन का दिन आ गया. पति महोदय को उनके ऑफिस से छुट्टी दिलाई. नहीं तो फोटो कौन खींचता?

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कार्यक्रम शुरू हुआ. मुझे नहीं पता था कि मेरे वाले साहित्यकार को ही और भी कई विमोचन करने थे. सो मेरे वाले विमोचन की बारी दो विमोचनों के बाद आई. विमोचन हुआ. फोटो खींचे. सबसे बढ़िया बात यह हुई कि वहाँ उपस्थित लोगों मे से दो ने मेरे ऑटोग्राफ भी लिए. आह, इतनी संतुष्टि मिली कि क्या बताऊँ. अरे नहीं, किताब बिकने की नहीं. वो तो मैंने पहले ही सबको दे के रखी थी. फोटो खिंचवा कर संतुष्टि मिली. अब फेसबुक की दीवार खूब चमकेगी मेरी.


चलो अब चलूँ. बाकी की किताबों को भी तो भेजना है मुझे उन्हें जिन लोगों ने अपना एड्रेस दिया है इनबॉक्स में. फिर अगले साल मिलती हूँ तुमसे फिर से अपने नॉवेल के लोकार्पण के साथ.

-सुनीता
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