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अरुण जेटली के नाम दिल्ली के डिप्टी सीएम सिसोदिया का ख़त, रियल एस्टेट GST से बाहर क्यों?

आदरणीय श्री अरुण जेटली जी, 

‘वन नेशन-वन टैक्स’ की अवधारणा पर जीएसटी लागू कर आप देश में सबसे बड़े टैक्स रिफॉर्म का नेतृत्व कर रहे हैं। जीएसटी काउंसिल की हर मीटिंग में आपने हर छोटे-बड़े मुद्दे को अपनी नेतृत्व क्षमता से जिस तरह से सुलझाया है, उसकी मैं तारीफ भी करूंगा और उसके लिए आपको बधाई भी देना चाहूंगा। लेकिन इतने बड़े टैक्स रिफॉर्म में हम एक बड़ी चूक कर रहे हैं। वह चूक है रियल इस्टेट सेक्टर को जीएसटी से बाहर रखना। मेरा मानना है कि रियल इस्टेट सेक्टर को जीएसटी के दायरे से बाहर रखकर हम देश में ब्लैक मनी के एक बहुत बड़े गलियारे को खुला रख रहे हैं।


मैंने काउंसिल की पिछली बैठकों में भी यह मुद्दा उठाया था। जिस वक्त काउंसिल ने रियल इस्टेट को जीएसटी से बाहर रखने का फैसला लिया, मैंने उस वक्त भी आग्रह किया था कि ये ठीक निर्णय नहीं है और इसे अभी आगे की चर्चा के लिए खुला रखा जाए। लेकिन कई माननीय सदस्य वित्त मंत्रियों के आग्रह पर इस मुद्दे को वहीं बंद कर दिया गया। मैं तब भी इससे सहमत नहीं था और आज भी इससे सहमत नहीं हूं।

दो दिन पहले इंडियन एक्सप्रेस अखबार में देश के प्रमुख वित्तीय सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन का एक लेख छपा है जिसमें उन्होंने रियल इस्टेट को जीएसटी के दायरे से बाहर रखने के नुकसान पर विस्तार से बताया है। मैं यहां उनके लेख में कही गई कुछ बातों को पुन: प्रस्तुत करना चाहूंगा।

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रियल इस्टेट को जीएसटी के दायरे में लाने से संबंधित चार बड़े मिथक हैं- 
1. इससे स्टैम्प ड्यूटी भी जीएसटी में शामिल हो जाएगी और राज्यों का जमीन की बिक्री के समय स्टैम्प ड्यूटी लगाने का अधिकार छिन जाएगा। जबकि सच यह है कि स्टैम्प ड्यूटी का जीएसटी से कोई वास्ता नहीं होगा।
2. कृषि भूमि पर जीएसटी लगने लगेगा। यह भी गलत तथ्य है। रियल इस्टेट के जीएसटी के दायरे में आने से कृषि भूमि किसी भी रूप में इस टैक्स के दायरे में नहीं आ सकती। 
3. सस्ते मकानों पर टैक्स लगेगा और वो महंगे हो जाएंगे। छोटे और सस्ते मकानों को इसके दायरे से बाहर रखने की सीमा तय कर इससे भी आसानी से बचा जा सकता है। 
4. रियल इस्टेट पर टैक्स का बोझ बढ़ेगा और प्रॉपर्टी के दाम महंगे हो जाएंगे। यह भी गलत है क्योंकि बिल्डिंग बनने में लगे रॉ मैटेरियल पर दिये गये टैक्स का इनपुट क्रेडिट अगर रियल इस्टेट डेवलपर लेगा तो उसे जीएसटी के बावजूद कीमत बढ़ाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

मेरा मानना है कि जीएसटी लागू होने से जमीन और प्रॉपर्टी के कारोबार में काफी हद तक पारदर्शिता आएगी, जमीनों और प्रॉपर्टीज की होर्डिंग रुकेगी और इससे अंतत: जरूरतमंद आम आदमी को अबके मुकाबले सस्ते दाम पर प्रॉपर्टी मिल सकेगी।

आज भी रियल इस्टेट पर लोकल बॉडीज, प्रॉपर्टी टैक्स लगाती हैं। खरीद-बिक्री होने पर स्टैम्प ड्यूटी लगती है। रियल इस्टेट को  जीएसटी के दायरे में लाने का मतलब ये हरगिज नहीं है कि प्रॉपर्टी टैक्स या स्टैम्प ड्यूटी भी जीएसटी में बदल जाएगी। साथ ही, आज भी जब कोई डेवलपर कोई बिल्डिंग बनाता है तो उसके वर्क कॉन्ट्रैक्ट पर लगभग 4.5 परसेंट सर्विस टैक्स लगता है। लेकिन इसके उलट रेडीमेड कमर्शियल या रेजिडेंशियल प्रॉपर्टी की बिक्री पर कोई सर्विस टैक्स नहीं है। यह आश्चर्यजनक है कि मकान बनाने के कॉन्ट्रैक्ट पर तो जीएसटी होगा लेकिन रेडीमेड प्रॉपर्टी पर जीएसटी नहीं होगा। यह कौन नहीं जानता है कि देश का रियल इस्टेट आज ब्लैक मनी का ऐसा कुआं बन गया है जिसमें राजनेताओं, नौकरशाहों सहित तमाम बड़े और प्रभावशाली लोगों का पैसा लग रहा है। इसलिए मेरी राय में रियल इस्टेट को जीएसटी से बाहर रखना ब्लैक मनी की बड़ी पाइपलाइन को बचाये रखने की कोशिश है।

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रियल इस्टेट, ब्लैक मनी और जीएसटी के संबंध को समझने के लिए मैं कुछ बिंदुओं की ओर ध्यान दिलाना चाहूंगा-
रियल इस्टेट में सबसे पहले जमीन का कारोबार आता है। सिर्फ बड़े-बड़े शहरों के आसपास नहीं बल्कि दूर-दराज के गांवों में भी लोगों ने ब्लैक मनी का इस्तेमाल कर जमीनों की होर्डिंग कर रखी है। इसीलिए जरूरतमंद लोगों को जमीनें महंगी दरों पर खरीदनी पड़ती है।

होर्डिंग करने वाले लोगों ने जमीनें सिर्फ खरीदकर डाल दी हैं। अब क्योंकि  प्रॉपर्टी डेवलप करने, उसके लिए रॉ मैटेरियल खरीदने, वर्क कॉन्ट्रैक्ट आदि का अधिकतर काम कच्ची बिक्री यानी बिना टैक्स दिये बिक्री पर होता है। इसका थोड़ा-बहुत ही कारोबार टैक्स देकर होता है।

अंत में, डेवलप्ड यानी रेडीमेड प्रॉपर्टी पर कोई जीएसटी नहीं लगेगा। इससे जमीन खरीदने से लेकर उसे प्रॉपर्टी के रूप में डेवलप करने और रेडीमेड प्रॉपर्टी के रूप में बेचने तक में इनपुट टैक्स क्रेडिट की पूरी चेन तितर-बितर हो गई है। यहीं, ब्लैक मनी का सारा खेल चलता है।

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अगर इन सभी चरणों पर जीएसटी लागू कर दिया जाता है तो हर बार जीएसटी देते वक्त पिछले बार दिये गये टैक्स का इनपुट क्रेडिट मिलेगा और प्रॉपर्टी के दाम नहीं बढ़ेंगे। लेकिन पूरी चेन आपस में जुड़ी रहेगी और रियल इस्टेट में ब्लैक मनी की गुंजाइश कम से कम होती चली जाएगी।

जीएसटी जैसा टैक्स रिफॉर्म करने के लिए सभी राजनीतिक दल बड़ी इच्छा शक्ति दिखा रहे हैं। रियल इस्टेट को जीएसटी में शामिल करने के लिए शायद और अधिक राजनीतिक इच्छा शक्ति की जरूरत है। मुझे लगता है कि अगर यह अभी नहीं हुआ तो फिर शायद ही कभी हो पाएगा। जीएसटी काउंसिल का चेयरमैन होने के नाते मेरा आपसे पुन: आग्रह है कि इस मुद्दे पर एक बार जरूर चर्चा करें। मैं इस पत्र की प्रतिलिपि सभी माननीय सदस्य वित्त मंत्रियों के समक्ष भी रख रहा हूं ताकि वे भी इस पर पुनर्विचार कर सकें। 
मुझे उम्मीद है कि हम सभी मिलकर रियल इस्टेट के कारोबार में ब्लैक मनी की सप्लाई रोकने के लिए यह कदम जरूर उठाएंगे। 

भवदीय 
मनीष सिसोदिया 
उप-मुख्यमंत्री/ वित्त मंत्री, दिल्ली सरकार
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