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संघियों का पैंट तो अपग्रेड हो गया, सोच कब अपग्रेड होगी?


स‌रसंघचालक जी,
आपके नाम के पहले प्रिय या आदरणीय इसलिए नहीं लिखा क्योंकि आपने अपने से ना तो किसी तरह के प्रेम की गुंजाइश छोड़ी है और ना ही आदर की! फिर आप हेयरार्की में इतना यकीन रखते हैं कि आपको अपना सीधा संबोधन भी नागवार गुजरता है। और अपना तो काम ही ऐसा कोई काम नहीं करना है, जो आपको गवारा गुजरे। बहराल अभी ये पुर्जीनुमा खत इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि आपके संगठन जितनी उम्र के आपके ड्रेस कोड में बदलाव की खबरें पढ़ रहा हूं।

Photo Courtesy: The Hindu
आपको बता दूं, आपकी ड्रेस से हमें कभी कोई राई-रत्ती भर भी दिक्कत नहीं रही। भले ही आप संस्कृति के स्वयंभू ठेकेदार बनकर पहनने के कपड़ों को सुविधा और पसंद से नहीं, झूठी संस्कृति और इज्जत से जोड़कर लोगों, खासकर लड़कियों के ‘क्या पहने, क्या ना पहने’ के अधिकार में घुसपैठ करते रहे हैं। इस देश में पहनने का अधिकार है। आप जो मर्जी हो वो पहनें। इससे मेरा कोई सरोकार नहीं है। हमने कभी आपके निक्कर को आलोचना करने का आधार बनाया भी नहीं। आपका मजाक उड़ाने के लिए जरूर आपको कई बार 'कच्छा वाला' कहा है। 'चड्ढीधारी' पुकारा है। मगर वह भी इसलिए क्योंकि हमें आपके विचार और सामाजिक व्यवहार से गहरी दिक्कत थी।

वैसे सच कहूं तो कमर से पतला और नीचे से अचानक बहुत ज्यादा चौड़ा हुआ आपका निक्कर ना तो पहनने के लिहाज से सुविधाजनक था और ना ही फैशन या दिखने के लिहाज से। आपको इतना बुद्धिहीन नहीं मान सकता कि आप ये नहीं जानते होंगे कि इसमें आप स्वयंसेवक कम, नमूने ज्यादा लगते थे। फिर भी आपको इसे बदलने में 90 साल लग गए तो शायद इसलिए, क्योंकि आप बदलाव से बहुत ज्यादा घबराते हैं। अपने में बदलाव से तो और भी ज्यादा।

वैसे आप जानते होंगे कपड़े में बदलाव तो आवरण मात्र का बदलाव है, जबकि आरएसएस को आत्मा बदलने या हृदय ट्रांसप्लांट करने की जरूरत है। सिर्फ ड्रेस बदलने में आपने इतना टाइम लगा दिया, दिल बदलने में लगने वाले आपके टाइम का अंदाजा लगा सकता है। पर आप यकीन करें आप जब भी इसे बदलेंगे हम आपके नाम के आगे प्रिय या आदरणीय जरूर लगाएंगे। पहले भी कह चुका हूं हमारे देश में पहनने का अधिकार है। आप अपने आप को महाराष्ट्र के नागपुर या उत्तर भारत के कुछ इलाके भर का नहीं, अपने को अखिल भारतीय संगठन मानते हैं तो फिर पूरे भारत में इलाकों के अनुसार संघ के स्वयंसेवकों का पहनावा क्यों नहीं बदलते??

कितना अच्छा होता कि दक्षिण भारत का स्वयंसेवक लुंगी या धोती पहनता और लखनउ का स्वयंसेवक पायजामा। सब अपनी-अपनी पसंद और संस्कृति के कपड़े पहन कर आपके शिविर में भागीदारी करते या जुलूस निकालते तो क्या छटा होती! क्या रंग होता! पूरा भारत उसमें दिखता। सब एक ड्रेस में तो एक दूसरे की भद्दी कॉपी ही लगेंगे। अपनी कथित सामूहिकता या सांगठनिकता में उनका व्यक्तित्व गुम नहीं हो जाएगा?? खैर आपका संगठन आपका फैसला। आप फुल पैंट पहने या हाफपैंट!

हम तो सिर्फ आपसे इतनी गुजारिश करना चाहते हैं कि बस चेहरे का नकाब या मास्क उतार लें। आपको जो भी करना हो अपने नाम से करें। ये जो आप हिंदू सेना, महावीर सेना, युवा वाहिनी, काली वाहिनी आदि-आदि का भेष बदलकर समाज में निकलते हैं। दंगा, फसाद कराते हैं! सोशल टेंशन फैलाकर समाज को बांटते हैं, वह ना करें। रात में भेष बदल कर नहीं निकलेंगे तो अपनी पहचान और लाज के खातिर भी आप वो सब नहीं करेंगे, जो आपकी ये छद्म सेनाएं करती हैं।

सरस‌ंघचालक जी! जानता हूं आपसे इन सुझावों पर गौर करने की उम्मीद पालना बहुत ज्यादा आशावादी होना है। पर हम आशावादी लोग हैं। हम आपके तमाम जड़तावाद के  बावजूद उम्मीद करते हैं कि आप इस पर गौर करेंगे। और आखिरी बात। प्लीज बदल जाइये। वैसे भी आप खुद नहीं बदलेंगे तो हम आपको बदल देंगे। वक्त आपको बदल देगा। बदलाव उतना बुरा शब्द नहीं है जितना आप सोचते हैं सरस‌ंघचालकजी!

आपका
उमाशंकर सिंह

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