-मनीष कौशल
सुपरकॉप केपीएस गिल के निधन का समाचार सुन कर मुझे उनके साथ की गईं अपनी कई मुलाकातें याद आ गईं। एक वक्त जब मैं दैनिक भास्कर के नेशनल ब्यूरो में था तो हर मंगलवार की शाम मेरी गिल साहब से मुलाकात तय थी। दरअसल, बृहस्पतिवार को केपीएस गिल साहब का आर्टिकल दैनिक भास्कर में छपता था। इसलिए मैं मंगलवार को उनके तालकटोरा रोड के निवास पर उनसे बातचीत करने जाया करता था, इस बातचीत को एडिटोरियल पेज के लिए आर्टिकल की शक्ल में तैयार करके देना मेरे काम का हिस्सा था।
कई बार तो मैं संसद के पास अपने रफ़ी मार्ग के दफ़्तर से पैदल ही चला जाया करता था, पहली बार पैदल पहुंचते हुए मैं तय वक़्त से थोड़ा देरी से पहुंचा। गार्ड ने बताया कि गिल साहब नहीं मिलेंगे, आप देरी से पहुंचे हैं, कल आइये। ये सुनकर मेरी हालत ख़राब हो गई, आर्टिकल तय वक़्त पर जाना था, मीडिया में सारा खेल डेडलाइन का है, मेरी तरफ़ से इसे बड़ी लापरवाही समझी जाती, मैं गार्ड की बात सुनकर भी वहां से टलने को तैयार नहीं था, गार्ड ने कहा जाइए साहब ने कह दिया तो नहीं मिलेंगे वो किसी और काम में मशरूफ़ हो गए हैं, मैंने कहा मैं इंतज़ार कर लूंगा।
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किसी तरह ये बात अंदर पहुंच गई, क़रीब 15 मिनट के इंतज़ार के बाद अंदर से बुलावा आ गया, मैं उनके विशाल बंगले के हरे बागीचे के कोने में बने कॉटेज को निहारते हुए अंदर पहुंचा, एक अर्दली टाइप का शख़्स पानी रख गया, थोड़ी देर बाद गिल साहब आए, पूरी तरह से तैयार जैसे कहीं जाना हो, मैंने देर से आने के लिए क्षमा मांगी उन्होंने कुछ नहीं कहा। मैं बैठ गया उन्हें लेख का विषय बताया, उनकी निगाहें बहुत तेज़ थीं, एक्स-रे की तरह जैसे सामने वाले के मन में क्या चल रहा हो, वो पढ़ लेते हों, बीच-बीच में वो अपनी शानदार मूंछों को उमेठना नहीं भूलते थे।
एक लंबा शख़्स जो उम्र के बावजूद भीतर की ताक़त से दमकता था, तब तक उनके हाथ में पैग आ गया। उन्होंने मुझसे भी पूछा मैंने विनम्रता से मना कर दिया। इसके बाद तो हर मुलाकात में ये होता था कि वो पैग पीते हुए मुझसे बातें करते और हर बार बात शुरू करने से पहले मुझसे पूछते ज़रूर थे। अब मैं सोचता हूं कि कभी मैंने हामी भर दी होती तो आज ये भी लिखता कि मैंने केपीएस गिल, सुपरकॉप के साथ पी है।
ख़ैर पहले दिन की बात ख़त्म हुई, चलते-चलते गिल साहब ने इतना कहा यंग मैन वक़्त का पाबंद होना ज़िंदगी में बहुत ज़रूरी है। मैंने बात गांठ बांध ली फ़िर कभी उनके यहां देरी से नहीं पहुंचा। एक बार उनके लेख का टॉपिक मानवाधिकार था, एक आतंकी की दया याचिका पर देश में हो हल्ला मचा था, इस मुद्दे पर बात करते हुए मैंने गिल साहब को पहली बार भावुक देखा। मानवाधिकार ब्रिगेड को लेकर उनके भीतर बहुत गुस्सा था, बात करते करते वो तरनतारन के उस एसपी की बात करने लगे जिसने मानवाधिकार उल्लंघन के कारण बहुत कुछ झेला और अंत में ट्रेन के आगे कूद कर आत्महत्या कर ली थी।
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तरनतारन में जब सेना भी घुसने से डरती थी तब गिल के चुने हुए एसपी ने वहां आतंक की कमर तोड़ दी। तब मैंने गिल साहब की आंखें पहली बार नम देखी थी। उन्होंने कहा ‘ही वाज़ माइ बॉय’, मानवाधिकार ब्रिगेड ने उसे मार डाला। ये गिल साहब की अपनी सोच थी, कुछ लोगों को असहमति हो सकती है लेकिन मैंने उनसे बात करते हुए जाना था कि आतंकवाद को ख़त्म करना कितना चुनौतीपूर्ण था। कितने लोगों ने कुर्बानियां दीं, ऐसी जंग में चाहते हुए भी हर वक्त मानवाधिकार की रक्षा करना संभव नहीं हो पाता। हालांकि लोकतंत्र में ये ज़िम्मेदारी ताक़तवर पर ही है कि वो हर इंसान के अधिकार की रक्षा करने की कोशिश करे।
कई बार तो मैं संसद के पास अपने रफ़ी मार्ग के दफ़्तर से पैदल ही चला जाया करता था, पहली बार पैदल पहुंचते हुए मैं तय वक़्त से थोड़ा देरी से पहुंचा। गार्ड ने बताया कि गिल साहब नहीं मिलेंगे, आप देरी से पहुंचे हैं, कल आइये। ये सुनकर मेरी हालत ख़राब हो गई, आर्टिकल तय वक़्त पर जाना था, मीडिया में सारा खेल डेडलाइन का है, मेरी तरफ़ से इसे बड़ी लापरवाही समझी जाती, मैं गार्ड की बात सुनकर भी वहां से टलने को तैयार नहीं था, गार्ड ने कहा जाइए साहब ने कह दिया तो नहीं मिलेंगे वो किसी और काम में मशरूफ़ हो गए हैं, मैंने कहा मैं इंतज़ार कर लूंगा।इसे भी पढ़ें...
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किसी तरह ये बात अंदर पहुंच गई, क़रीब 15 मिनट के इंतज़ार के बाद अंदर से बुलावा आ गया, मैं उनके विशाल बंगले के हरे बागीचे के कोने में बने कॉटेज को निहारते हुए अंदर पहुंचा, एक अर्दली टाइप का शख़्स पानी रख गया, थोड़ी देर बाद गिल साहब आए, पूरी तरह से तैयार जैसे कहीं जाना हो, मैंने देर से आने के लिए क्षमा मांगी उन्होंने कुछ नहीं कहा। मैं बैठ गया उन्हें लेख का विषय बताया, उनकी निगाहें बहुत तेज़ थीं, एक्स-रे की तरह जैसे सामने वाले के मन में क्या चल रहा हो, वो पढ़ लेते हों, बीच-बीच में वो अपनी शानदार मूंछों को उमेठना नहीं भूलते थे।
एक लंबा शख़्स जो उम्र के बावजूद भीतर की ताक़त से दमकता था, तब तक उनके हाथ में पैग आ गया। उन्होंने मुझसे भी पूछा मैंने विनम्रता से मना कर दिया। इसके बाद तो हर मुलाकात में ये होता था कि वो पैग पीते हुए मुझसे बातें करते और हर बार बात शुरू करने से पहले मुझसे पूछते ज़रूर थे। अब मैं सोचता हूं कि कभी मैंने हामी भर दी होती तो आज ये भी लिखता कि मैंने केपीएस गिल, सुपरकॉप के साथ पी है।
ख़ैर पहले दिन की बात ख़त्म हुई, चलते-चलते गिल साहब ने इतना कहा यंग मैन वक़्त का पाबंद होना ज़िंदगी में बहुत ज़रूरी है। मैंने बात गांठ बांध ली फ़िर कभी उनके यहां देरी से नहीं पहुंचा। एक बार उनके लेख का टॉपिक मानवाधिकार था, एक आतंकी की दया याचिका पर देश में हो हल्ला मचा था, इस मुद्दे पर बात करते हुए मैंने गिल साहब को पहली बार भावुक देखा। मानवाधिकार ब्रिगेड को लेकर उनके भीतर बहुत गुस्सा था, बात करते करते वो तरनतारन के उस एसपी की बात करने लगे जिसने मानवाधिकार उल्लंघन के कारण बहुत कुछ झेला और अंत में ट्रेन के आगे कूद कर आत्महत्या कर ली थी।
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तरनतारन में जब सेना भी घुसने से डरती थी तब गिल के चुने हुए एसपी ने वहां आतंक की कमर तोड़ दी। तब मैंने गिल साहब की आंखें पहली बार नम देखी थी। उन्होंने कहा ‘ही वाज़ माइ बॉय’, मानवाधिकार ब्रिगेड ने उसे मार डाला। ये गिल साहब की अपनी सोच थी, कुछ लोगों को असहमति हो सकती है लेकिन मैंने उनसे बात करते हुए जाना था कि आतंकवाद को ख़त्म करना कितना चुनौतीपूर्ण था। कितने लोगों ने कुर्बानियां दीं, ऐसी जंग में चाहते हुए भी हर वक्त मानवाधिकार की रक्षा करना संभव नहीं हो पाता। हालांकि लोकतंत्र में ये ज़िम्मेदारी ताक़तवर पर ही है कि वो हर इंसान के अधिकार की रक्षा करने की कोशिश करे।
बहरहाल, आज गिल साहब हमारे बीच नहीं हैं लेकिन जिस तरह से कश्मीर जल रहा है, उसे देखते हुए शायद हममें से बहुत से लोग सोचते होंगे कि एक और केपीएस गिल की देश को ज़रूरत है।
सुपरकॉप को मेरी विनम्र श्रद्धांजलि
[अगर आप भी लिखना चाहते हैं कोई ऐसी चिट्ठी, जिसे दूसरों तक पहुंचना चाहिए, तो हमें लिख भेजें- merekhatt@gmail.com. हमसे फेसबुक, ट्विटर और गूगलप्लस पर भी जुड़ें]
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