- रजिया एस रूही
कान पक गये हैं, सुन-सुन कर कि कुरान मे ये लिखा है, कुरान मे वो लिखा है। हदीसों के हवाले दिये जाते हैं और इमरानाओं के साथ बलात्कार होते हैं। हमारे देवबंदी आका बेहूदे फ़तवे सुनाते हैं। मलालाओं को गोली मारी जाती है। स्कूल जाने वाली बच्चियां उठा ली जाती हैं। मतदान करने वालों के अंगूठे काटे जाते हैं। कोई इस्लामी जेहादी संगठन कहता है कि अगर वहां की औरतों ने हिजाब से चेहरा न ढका तो ये उन पर तेजाब डाल देंगे। ये सब आखिर मुस्लिम समुदाय में पैदा होने वाले ही क्यों हैं? इन्होंने भी कुरान हदीसें पढ़ी हैं?
अगर ये सिर्फ चन्द बुरे लोग हैं तो अल्लाह बाकी नेक बंदे क्या करते हैं? सिर्फ तस्लीमाओं पर कुर्सियां, पत्थर और गालियां बरसाते हैं? पेटा की लानत-मलानत कर बेनजीर को मस्जिद में कैद करके पीटते हैं? अपनी जाहिलियत और दकियानूसी अतार्किक अमानवीय कुप्रथाओं को कुतर्क के ज़रिये सही ठहराते हैं और क्या कुछ करते हैं? क्या आप बता सकते हैं कि सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से मुस्लिम समुदाय ही सबसे ज्यादा पिछड़ा क्यों है? क्या वजह है कि आज तक चिकित्सा विज्ञान, अर्थशास्त्र और साहित्य के कितने नोबेल किसी मुस्लिम देश को मिले? इसमें शांति के नोबेल न जोड़ियेगा क्योंकि ये हिंसक धर्म के बीच फंसे लोगों की जान की कीमत है, जो शांति को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से दी जाती है।
बहुत से मुस्लिम ब्याज खा रहे हैं। शराब पी रहे हैं। दहेज़ ले दे रहे हैं और तमाम काम जो इस्लाम में हराम/ शिर्क़/ कुफ़्र घोषित हैं, कर रहे हैं। शरीया के पैरोकारों की मौन सहमति है इन पर। इनका बहिष्कार कोई नहीं करता? लेकिन बात जब 4 निकाह, जुबानी तलाक़, हलाला, इद्दत को गैरकानूनी घोषित करने की होती है तो शरीयत के पैरोकार विरोध में लामबंद हो जाते हैं।
एक ही वक़्त पर एक से ज्यादा बीवी रखने के विकल्प के लिए, तीन बार तलाक़ बोल कर जल्दी छुटकारा पाने के लिए, इद्दत के नाम पर औरत को टॉर्चर करने के लिये, हलाला के नाम पर दुनिया को अपने ऊपर थूकने का मौक़ा देने के लिये इनको तथाकथित कठमुल्लों की तय की हुई शरीया चाहिये। लेकिन खुद चोरी, डकैती, बलात्कार करने के बाद जमानत पर छूट जाने के लिये इनको भारतीय कानून चाहिये। औरतें इस्तेमाल करने के लिये इन्हें 1400 साल पुराना मज़हबी कानून चाहिये। लेकिन इलेक्ट्रानिक आइटम इस्तेमाल करने के लिये इन्हें नया कंज्यूमर प्रोटेक्शन लॉ चाहिये। दोगलापन और किसे कहते हैं?
कान पक गये हैं, सुन-सुन कर कि कुरान मे ये लिखा है, कुरान मे वो लिखा है। हदीसों के हवाले दिये जाते हैं और इमरानाओं के साथ बलात्कार होते हैं। हमारे देवबंदी आका बेहूदे फ़तवे सुनाते हैं। मलालाओं को गोली मारी जाती है। स्कूल जाने वाली बच्चियां उठा ली जाती हैं। मतदान करने वालों के अंगूठे काटे जाते हैं। कोई इस्लामी जेहादी संगठन कहता है कि अगर वहां की औरतों ने हिजाब से चेहरा न ढका तो ये उन पर तेजाब डाल देंगे। ये सब आखिर मुस्लिम समुदाय में पैदा होने वाले ही क्यों हैं? इन्होंने भी कुरान हदीसें पढ़ी हैं?
अगर ये सिर्फ चन्द बुरे लोग हैं तो अल्लाह बाकी नेक बंदे क्या करते हैं? सिर्फ तस्लीमाओं पर कुर्सियां, पत्थर और गालियां बरसाते हैं? पेटा की लानत-मलानत कर बेनजीर को मस्जिद में कैद करके पीटते हैं? अपनी जाहिलियत और दकियानूसी अतार्किक अमानवीय कुप्रथाओं को कुतर्क के ज़रिये सही ठहराते हैं और क्या कुछ करते हैं? क्या आप बता सकते हैं कि सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से मुस्लिम समुदाय ही सबसे ज्यादा पिछड़ा क्यों है? क्या वजह है कि आज तक चिकित्सा विज्ञान, अर्थशास्त्र और साहित्य के कितने नोबेल किसी मुस्लिम देश को मिले? इसमें शांति के नोबेल न जोड़ियेगा क्योंकि ये हिंसक धर्म के बीच फंसे लोगों की जान की कीमत है, जो शांति को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से दी जाती है।बहुत से मुस्लिम ब्याज खा रहे हैं। शराब पी रहे हैं। दहेज़ ले दे रहे हैं और तमाम काम जो इस्लाम में हराम/ शिर्क़/ कुफ़्र घोषित हैं, कर रहे हैं। शरीया के पैरोकारों की मौन सहमति है इन पर। इनका बहिष्कार कोई नहीं करता? लेकिन बात जब 4 निकाह, जुबानी तलाक़, हलाला, इद्दत को गैरकानूनी घोषित करने की होती है तो शरीयत के पैरोकार विरोध में लामबंद हो जाते हैं।
एक ही वक़्त पर एक से ज्यादा बीवी रखने के विकल्प के लिए, तीन बार तलाक़ बोल कर जल्दी छुटकारा पाने के लिए, इद्दत के नाम पर औरत को टॉर्चर करने के लिये, हलाला के नाम पर दुनिया को अपने ऊपर थूकने का मौक़ा देने के लिये इनको तथाकथित कठमुल्लों की तय की हुई शरीया चाहिये। लेकिन खुद चोरी, डकैती, बलात्कार करने के बाद जमानत पर छूट जाने के लिये इनको भारतीय कानून चाहिये। औरतें इस्तेमाल करने के लिये इन्हें 1400 साल पुराना मज़हबी कानून चाहिये। लेकिन इलेक्ट्रानिक आइटम इस्तेमाल करने के लिये इन्हें नया कंज्यूमर प्रोटेक्शन लॉ चाहिये। दोगलापन और किसे कहते हैं?