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जनसत्ता के स‌ंपादक मुकेश भारद्वाज को अशोक वाजपेयी की चिट्ठी

तारीख- 27 जनवरी, 2016 

प्रिय श्री भारद्वाज,
कल शाम मुझे आपके स‌ंपादकीय स‌हयोगी डॉ. स‌ूर्यनाथ स‌िंह का फोन पर यह स‌ंदेश मिला कि आप 'कभी कभार' स्तम्भ स्थगित कर रहे हैं और इस बारे में मुझसे बात करेंगे। इस बारे में बात करने की कोई खास जरूरत नहीं है। यह आपका स‌ंपादकीय फैसला है, जिसका आपको पूरा अधिकार है। 1997 में तब के स‌ंपादक श्री अच्युतानंद मिश्र मेरे घर आये थे और उन्होंने 'जनसत्ता' में नियमित रूप स‌े लिखने का आग्रह किया था जिस कारण 'कभी कभार' शुरू हुआ था। उसके बाद के स‌ंपादक ओम थानवी के इसरार पर मैं हाल तक लिखता रहा। इस वर्ष उसके अबाध गति स‌े नियमित चलने के 18 वर्ष हो जाते। हिंदी में शायद ही किसी और स्तम्भ की आयु और निरंतरता इतनी लंबी रही है। आप तीसरे स‌ंपादक हैं। आपने उसे स‌माप्त करने का फैसला किया है। जाहिर है कि तीनों ने ही अपने विवेक और स्वभाव के अनुरूप कार्य किया है। आप पर कोई राजनैतिक दबाव पड़ा होगा ऎसी अटकल मैं अभी नहीं लगाता।

अपने फैसले की स‌ूचना स‌ीधे मुझे न देकर आपने अपने स‌हयोगी का स‌हारा लिया और अभी पिछले शनिवार को उन्हीं स‌े यह फोन मुझे करवाया कि पिछले रविवार की किस्त नहीं मिला है। मैं जयपुर में था और इतनी शाम कुछ नहीं हो स‌कता था। मैंने चेक किया वह किस्त हस्बे-मामूल आपके दफ्तर के चौकीदार को मेरा ड्राइवर देकर आया था और उसकी पावती वहां के रजिस्टर में दर्ज है। स‌ालों स‌े यही प्रथा रही है और इसमें कभी कोई चूक या देर नहीं हुई है। वह किस्त नहीं छपी तो यह आपके फैस‌ले का पूर्वरंग ही था। न छपने को लेकर मेरे पास देश स‌े बीसियों फोन आये। आपको यह स्वांग करने की कतई जरूरत नहीं थी आप कुछ महीनों स‌ंपादक हैं, मैं 77 वर्ष आयु का हूं और आपके अखबार का स‌बसे पुराना- लंबा 18 स‌ाल स‌े अधिक वर्षों स‌े स्तम्भकार हूं। आपको मुझे स‌ीधे बताकर अपना फैसला बताने का स‌ौजन्य बरतना चाहिये था। आप निश्चिंत रहें, आपके चाहे अनुसार मैं आपके स‌म्मान्य अखबर में 'कभी कभार' स्तम्भ तत्काल स‌माप्त कर रहा हूं। पिछली किस्त जो आपके दफ्तर में कहीं प़ड़ी होगी मुझे वापस कर दें। मेरे पास उसकी प्रति नहीं है और आपके वह किसी काम की न होगी। उसको लेकर स्वांग तो हो ही चुका है।

आपसे कभी भेंट नहीं हुई। आपने एक बार फोन पर अलबत्ता कहा था कि 'आपके शब्द तो मोतियों जैसे टंके होते हैं और उसमें कटौती हम नहीं कर स‌कते'। पर नये लेआउट के कारण जगह कम हो गयी है तो आप तीन के बजाय ढाई पृष्ठों में ही किस्त लिखें। मैंने उसके अनुसार कम लिखना शुरू किया। आपने उसमें, फिर भी, कुछ कतर-ब्योंत करना शुरू किया। 'जनसत्ता' ने स‌ाफ-सुथरी स‌टीक हिंदी भाषा की एक यशस्वी परंपरा बनायी थी। आपने उसे विरत होकर बाकी हिंदी अखबारों की तरह खिचड़ी हिंदी का प्रयोग बढ़ाना शुरू कर दिया। 'जनसत्ता' हिंदी का स‌बस‌े बौद्धिक और स‌ांस्कृतिक अखबार था। आपने उसकी इस छवि को भी व्यर्थ मानकर उसका रूप घटाना शुरू कर दिया। लगता है कि स‌ोचने-समझनेवालों में उसकी अपठनीयता दिनोंदिन बढ़ रही है पर हो स‌कता है मैं यह स‌ब अपनी कुन्दजहनी, तंगदिली और कमजोरी में स‌ोच रहा हूं। आपके पास बेहतर आंकड़े होंगे।

अंत में 'जनसत्ता' का बहुत आभारी हूं कि उसने मुझे लगातार हर स‌प्ताह कुछ लिखने-सोचने-समझने-पूछने की जगह इतने वर्ष दी। इस अनुभव और अभ्यास ने मेरे स‌ाहित्यिक और स‌ार्वजनिक जीवन को स‌मृद्ध बनाने में मदद की- स‌म्प्रेषणीयता और स‌ुथरेपन के कई नये पक्ष मैं स‌मझ-बरत स‌का। उसमें प्रकाशित स‌ामग्री स‌े अनेक पुस्तकें तैयार हुईं हैं और अपने ढंग की अनूठी पुस्तकें मानी जाती हैं। 

'जनसत्ता' और आपके पथ शुभ हों ऎसी स्वस्तिकामना करता हूं। 

अशोक वाजपेयी  
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