- असित नाथ तिवारी
आदरणीय निर्मला सीतारमण जी,
देश का वित्त मंत्री होने के नाते 5 जुलाई को आपने देश का जो बजट पेश किया उसमें मीडिया में विदेशी पूंजी निवेश का जिक्र भी था। मीडिया में विदेशी पूंजी निवेश के लिए पहला दरवाजा स्वर्गीय अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार में खुला। 26 फीसदी विदेशी पूंजी निवेश का वो फैसला हैरान करने वाला लगता है। अब आपने भी कहा है कि मीडिया में विदेशी पूंजी निवेश को और सहज बनाया जाएगा।
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'हां NDTV देशद्रोही है क्योंकि वो बाबाओं की समोसा-चटनी खिलाकर दर्शकों का कल्याण नहीं करता'
निर्मला जी, एक पत्रकार होने के नाते मैं आपकी सरकार के इस फैसले का विरोध करता हूं और अगर फैसले को बदला नहीं गया तो आगे भी इसका विरोध करता रहूंगा। खुले और विदेशी बाजार के दबदबे के बावजूद भारतीय मीडिया ने देश के बहुसंख्यक गरीबों, दलितों और दीन-हीन लोगों की चिंता नहीं छोड़ी है। भारतीय मीडिया तमाम गिरावट के बाद भी सिर्फ और सिर्फ विज्ञापनदाताओं और पूंजी की बात नहीं करता। मीडिया को ये संस्कार देश के स्वतंत्रता संग्राम और पुनर्जागरण से मिले हैं। भारत का मीडिया अगर नागरिकों के मूल अधिकार का औजार और प्रतिनिधि बनकर नहीं रह सकता, तो फिर उसकी कोई ज़रूरत भी नहीं होगी। नागरिकों के प्रति यह उत्तरदायित्व ही हमारे मीडिया की आज़ादी की गारंटी है।
संभव है कुछ अखबार और टीवी चैनल के मालिक ये चाहते हों कि भारतीय मीडिया में विदेशी धन के तमाम दरवाजे खोल दिए जाएं। लेकिन सच ये है कि जब ये पूंजी आएगी तो वह भारत के आम लोगों को निष्पक्ष सूचना देने के लिए नहीं आएगी। इस पूंजी का मकसद सिर्फ और सिर्फ मुनाफा कमाना होगा। पूंजी लोगों के प्रति नहीं अपने ही प्रति जिम्मेदार मानी जाती है।
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भारत में मीडिया सिर्फ सूचना देने का काम नहीं करता, ये लोगों के मत निर्माण का बहुत बड़ा साधन भी है। खुद से पूछिए कि भारत और चीन के बीच डोकलाम को लेकर विवाद छिड़ गया तो फिर चीन के पैसों से फलने-फूलने वाला कोई भारतीय अखबार लोगों को किस तरह की सूचना देगा? क्या वो निष्पक्षता से भारत का पक्ष रख पाएगा? जाहिर है वैसा कोई भी अखबार धीरे-धीरे लोगों को वो समझाना चाहेगा जो चीन के हित में हो। ये सिर्फ एक उदाहरण है। ऐसे कई उदाहरण हो सकते हैं। पत्रकारिता मोबाइल फोन अथवा लैपटॉप बेचने का व्यवसाय नहीं है। भले ही यह व्यवसाय है लेकिन, ये व्यवसाय लोकमत तैयार करता है। लोगों की सोच को प्रभावित करने वाले इस व्यवसाय में विदेशी पूंजी के लिए कई दरवाजे खोलने के नतीजे ख़तरनाक होंगे। मीडिया व्यवसाय तो है लेकिन राष्ट्रीय जड़ों वाली रष्ट्रीय संस्था भी है। इसे सीधे विदेशी पूंजी के हवाले नहीं किया जाना चाहिए।
पिछले सत्तर सालों में लोकतंत्र को मजबूत करने में भारतीय मीडिया की भूमिका बड़ी बलिदानी, निर्माणकारी, स्वतंत्र और निष्पक्ष रही है। देश की आजादी की लड़ाई और देश के निर्माण में जैसा योगदान हमारे मीडिया का है वैसा किसी भी विकसित देश के मीडिया का नहीं है।
इसलिए आपसे निवेदन है कि भारत की पत्रकारिता को विदेशी पूंजी का ग़ुलाम मत बनाइए। भारत की पत्रकारिता भारत के लोगों की सोच को गहरे तक प्रभावित करती है। विदेशी पूंजी का प्रभाव भारत की संप्रभुता के लिए खतरनाक साबित होगा।
आपके देश का एक अदना पत्रकार
आदरणीय निर्मला सीतारमण जी,
देश का वित्त मंत्री होने के नाते 5 जुलाई को आपने देश का जो बजट पेश किया उसमें मीडिया में विदेशी पूंजी निवेश का जिक्र भी था। मीडिया में विदेशी पूंजी निवेश के लिए पहला दरवाजा स्वर्गीय अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार में खुला। 26 फीसदी विदेशी पूंजी निवेश का वो फैसला हैरान करने वाला लगता है। अब आपने भी कहा है कि मीडिया में विदेशी पूंजी निवेश को और सहज बनाया जाएगा।
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'हां NDTV देशद्रोही है क्योंकि वो बाबाओं की समोसा-चटनी खिलाकर दर्शकों का कल्याण नहीं करता'
निर्मला जी, एक पत्रकार होने के नाते मैं आपकी सरकार के इस फैसले का विरोध करता हूं और अगर फैसले को बदला नहीं गया तो आगे भी इसका विरोध करता रहूंगा। खुले और विदेशी बाजार के दबदबे के बावजूद भारतीय मीडिया ने देश के बहुसंख्यक गरीबों, दलितों और दीन-हीन लोगों की चिंता नहीं छोड़ी है। भारतीय मीडिया तमाम गिरावट के बाद भी सिर्फ और सिर्फ विज्ञापनदाताओं और पूंजी की बात नहीं करता। मीडिया को ये संस्कार देश के स्वतंत्रता संग्राम और पुनर्जागरण से मिले हैं। भारत का मीडिया अगर नागरिकों के मूल अधिकार का औजार और प्रतिनिधि बनकर नहीं रह सकता, तो फिर उसकी कोई ज़रूरत भी नहीं होगी। नागरिकों के प्रति यह उत्तरदायित्व ही हमारे मीडिया की आज़ादी की गारंटी है।
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रवीश को पत्र लिखने वाले को मेरा जवाब, जो ‘बीमार’ नहीं है वो सवालों के घेरे में हैं ! संभव है कुछ अखबार और टीवी चैनल के मालिक ये चाहते हों कि भारतीय मीडिया में विदेशी धन के तमाम दरवाजे खोल दिए जाएं। लेकिन सच ये है कि जब ये पूंजी आएगी तो वह भारत के आम लोगों को निष्पक्ष सूचना देने के लिए नहीं आएगी। इस पूंजी का मकसद सिर्फ और सिर्फ मुनाफा कमाना होगा। पूंजी लोगों के प्रति नहीं अपने ही प्रति जिम्मेदार मानी जाती है।
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भारत में मीडिया सिर्फ सूचना देने का काम नहीं करता, ये लोगों के मत निर्माण का बहुत बड़ा साधन भी है। खुद से पूछिए कि भारत और चीन के बीच डोकलाम को लेकर विवाद छिड़ गया तो फिर चीन के पैसों से फलने-फूलने वाला कोई भारतीय अखबार लोगों को किस तरह की सूचना देगा? क्या वो निष्पक्षता से भारत का पक्ष रख पाएगा? जाहिर है वैसा कोई भी अखबार धीरे-धीरे लोगों को वो समझाना चाहेगा जो चीन के हित में हो। ये सिर्फ एक उदाहरण है। ऐसे कई उदाहरण हो सकते हैं। पत्रकारिता मोबाइल फोन अथवा लैपटॉप बेचने का व्यवसाय नहीं है। भले ही यह व्यवसाय है लेकिन, ये व्यवसाय लोकमत तैयार करता है। लोगों की सोच को प्रभावित करने वाले इस व्यवसाय में विदेशी पूंजी के लिए कई दरवाजे खोलने के नतीजे ख़तरनाक होंगे। मीडिया व्यवसाय तो है लेकिन राष्ट्रीय जड़ों वाली रष्ट्रीय संस्था भी है। इसे सीधे विदेशी पूंजी के हवाले नहीं किया जाना चाहिए।
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रवीश कुमार को इंडिया न्यूज़ के एंकर सुशांत सिन्हा का खुला ख़त, अभी आप बीमार हैंपिछले सत्तर सालों में लोकतंत्र को मजबूत करने में भारतीय मीडिया की भूमिका बड़ी बलिदानी, निर्माणकारी, स्वतंत्र और निष्पक्ष रही है। देश की आजादी की लड़ाई और देश के निर्माण में जैसा योगदान हमारे मीडिया का है वैसा किसी भी विकसित देश के मीडिया का नहीं है।
इसलिए आपसे निवेदन है कि भारत की पत्रकारिता को विदेशी पूंजी का ग़ुलाम मत बनाइए। भारत की पत्रकारिता भारत के लोगों की सोच को गहरे तक प्रभावित करती है। विदेशी पूंजी का प्रभाव भारत की संप्रभुता के लिए खतरनाक साबित होगा।
आपके देश का एक अदना पत्रकार
