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'सरबजीत' देखकर एक बार फिर यकीन हो गया कि दुनिया में ईश्वर का कोई अस्तित्व नहीं


-पूनम लाल 
मैं कल बहुत रोई। फिल्म "सरबजीत" है ही ऐसी। मानवीय संवेदनाओ से भरी हुई। लेकिन इस फिल्म को देखने के बाद यह बात और भी पक्की हो गई कि वाकई में भगवान नहीं है। यह विश्वास और भी पक्का हो गया कि ईश्वर लोगों को मूर्ख और कमज़ोर बनाने के लिए ही है। एक बेकसूर को बेवजह 21 साल तक अमानवीय यातनाएं दी गईं। उसके परिवार वालों से शायद ही कोई ऐसा मंदिर, मस्जिद,गुरुद्वारा, पीर, फकीर, पंडित बचा होगा, जहां जाकर अपने भाई के लिए उसकी बहन ने और एक पत्नी ने पति के लिए, बेटियों ने पिता के लिए और बूढ़े बाप ने बेटे के लिए माथा न टेका हो, दुआएं न मांगी हों। अगर वाकई में ईश्वर होता तो सुनता तो जरूर।


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21 साल बहुत होते हैं दुआओं के लिए। हम एक बेवजह की चीज को 'ईश्वर' का नाम देकर लोगों को गुमराह कर रहे हैं। यह काम बखूबी करा जा रहा है। जिसकी जरूरत है वह चीज लोगों में नहीं है, वह है इंसानियत। किसी और के दर्द को महसूस करना इंसान होने की शायद सबसे पहली शर्त है। जो ऐसा नहीं करते उन्हें खुद को इंसान कहलाने का हक नहीं है। मैं 2 घंटे 30 मिनट की फिल्म को भूल नहीं पाई सिर्फ रोती ही रही। आँखें सूज गईं। नाक लाल हो गई थी। पर सोचती हूँ कि उसके परिवार ने कैसे झेला होगा। उस व्यक्ति ने कैसे इसको बर्दाश्त किया होगा।


कुछ नहीं है। ईश्वर नहीं है। भगवान नहीं है। हमको इस मायाजाल से निकलना होगा। इंसान बनिये। इंसानियत अपनाइए, जो मौजूदा हालत में सबसे ज्यादा जरूरी है। कुछ मूर्ख कहेंगे कि वह पाकिस्तान की जेल में बन्द था। भारत की नहीं, तो ऐसे कमअक्लों से सवाल है कि सरहदें अगर हवा और रोशनी के लिए नहीं हैं, तो तुम्हारे भगवान के लिए क्यों है?

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