प्रिय मीडिया के लोगों,
बचपन से ही कुछ महान पत्रकारों के प्रति मेरे मन में आदर का भाव रहा है, ये वो पत्रकार है जिन्होंने युद्ध के मैदान, आतंकी हमले और प्राकृतिक आपदा जैसी परिस्थितियों में डटे रहकर, अपनी जान की बाजी लगाकर सीधे सच हम तक पहुंचाया है. ऐसे ही लोगों से प्रभावित होकर मैंने बिना किसी हिचकिचाहट के मास कॉम (जनसंचार) और पत्रकारिता की डिग्री हासिल की. मुझे हमेशा इस बात से (मास कॉम और पत्रकारिता की डिग्री हासिल करने से) खुशी मिलती थी! मैं सोचती थी कि मीडिया के लोग अपनी जिंदगी दांव पर लगाकर लोगों तक सच पहुंचाते हैं. पर ये क्या! एक दिन अचानक इसी मीडिया ने मेरी जिंदगी में भूचाल ला दिया. बहुत-बहुत शुक्रिया!
मुझे यह पता है कि सब कुछ प्रतिक्रियाओं पर आधारित था और इसी दरम्यान कई सारी गलत ख़बर बना दी गईं. साथ में मेरा...इंतजार, पर मेरे बयान का इंतजार नहीं किया गया.
“मैंने अपने करियर में गलत फैसले किए हैं और मेरे पास पैसे नहीं है. मुझे अपने परिवार को चलाना पड़ता है और कई अच्छे काम भी करने पड़ते हैं. सभी दरवाजे बंद हो गए थे और कुछ लोगों ने मुझे वेश्याव़ति अपनाने की सलाह दी. मेरे पास कोई चारा नहीं था. कोई और विकल्प नहीं होने के कारण, मैं इस काम में शामिल हो गई. मैं अकेली नहीं हूं, जिसे इस दिक्कत का सामना करना पड़ा है और कई सारी ऐसी हीरोइनें हैं जो इस दौर से गुजरी हैं.”
सच में?? आप जो कोई भी हैं, किसने इस बयान की कल्पना की और इसे लिखा, क्या आप काम करते वक्त सिगरेट के नशे में थे? कौन ऐसी बातें करता है? ये बयान 80 के दशक में बनी किसी बॉलीबुड फिल्म का लगता है. साथ ही इस बयान में इतने सारे ‘और’ जोड़ने की क्या जरूरत थी, स्कूल जाकर अपनी भाषा पर मेहनत करो वेबकूफ! शुक्र है कि मेरे परिवार, मेरे दोस्तों और जो लोग मुझे जानते हैं उन्होंने इस बयान पर भरोसा नहीं किया. उन्हें पता है कि मैं ऐसी बात नहीं करती हूं. पर भारत और बाकी लोगों के लिए, चाहे पूरी दुनिया में वे कहीं भी हो, आखिरी बार: ये मेरा बयान नहीं है (जो मीडिया ने लोगों तक पहुंचाया).
हमारे समाज के साथ जो दिक्कत है वो यह है कि जब तक मुझे सहानुभूति मिल रही थी सब मेरा साथ दे रहे थे. जैसी ही लोगों को लगा कि वो (मीडिया में आई ख़बरों से) बहक गए थे और 23 साल की एक लड़की बिना किसी सहानुभूति के अपने कदमों पर खड़ी हो सकती है, समाज को लगा कि वो झूठ बोल रही है? इसमें मेरी क्या गलती है कि मीडिया के काम करने का यही तरीका है. मैं किसी पर इस बात का दबाव नहीं डाल सकती कि वे मुझे पसंद या मेरी इज्जत करें. जो हुआ, खुद-ब-खुद हुआ. जो हुआ वो मेरे नियंत्रण से बाहर था.
मेरी गिरफ्तारी के बाद मुझे सुधार गृह भेज दिया गया जहां मुझे साढ़े 59 दिन बिताने पड़े. (60वें दिन मैं घर लौटी), इस बीच मैंने मीडिया को कब और कैसे बयान दे दिया? मेरा फोन जब्त कर लिया गया था, मैंने कुछ आखिरी कॉल्स मेरी मां और मेरे करीबी दोस्तों को किया. ये दो महीने मैं अख़बार, टीवी, इंटरनेट और रेडियो जैसे किसी माध्यम से महरूम थी. प्रज्वला सुधार गृह के बाहर क्या चल रहा था इसका मुझे कोई पता नहीं था. हां, वहां मेरा वक्त बड़ा अच्छा गुजरा. मैंने वहां बच्चों को हिंदी, अंग्रेजी और हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत सिखाया. मैं हमेशा उन बच्चों के लिए प्रर्थना करुंगी. मैंने उन दो महीनों में 12 किताबें खत्म कीं. मैंने इस दौरान बहुत कुछ सीखा.
30 अक्टूबर 2014 को जब दो महीने बाद मैं बाहर आई तो पिछले दो महीनों में मेरे बारे में फैलाई गई ख़बरों का मुझे पता चला, मुझे दुख की जगह हैरानी हुई! एक ख़बर में लिखा गया था कि पुलिस वालों ने (मीडिया को) यह बताया कि मैंने ऐसा बयान दिया है पर जब मैंने हैदराबाद संपर्क किया तो पुलिस ने ऐसी किसी बात से इनकार कर दिया. एक बात और कि ऐसे मामलों में पुलिस के पास आरोपी की पहचान बताने का अधिकार नहीं होता है, जिससे ये बात साफ होती है कि पुलिस ने ऐसा कोई बयान नहीं दिया. ऐसा करना कानून के खिलाफ है. पुलिस ऐसा कैसे कर सकती है, जब ऐसा कोई बयान मौजूद ही नहीं है. मेरी गैरमौजूदगी, मेरे बयान गढ़ने वालों के लिए एक मौका बन गई.
मेरी जिंदगी में ये बिजनेसमैन कौन हैं, कोई बताएगा? मैं भी उतनी ही हैरान हूं जितना बाकी लोग! तो पहेली यहां सुलझती है: मेरे साथ पकड़े गए व्यापारी का नाम क्यों सार्वजनिक नहीं किया गया? एक क्लू: जब मेरी गिरफ्तारी हुई थी तब क्या वहां कोई बिजनेसमैन मौजूद भी था? जरा सोचिए. इस बात को सच साबित कर के दिखाइए!
30 अगस्त को होने वाले संतोषम अवॉर्ड्स के सिलसिले में मैं हैदराबाद में थी. मुझे कभी किसी ने वेश्याव़ति में आने की सलाह नहीं दी और मेरा टिकट किसी ने बुक नहीं किया, न ही वहां कोई मौजूद था! मेरा टिकट और रहने की व्यवस्था समारोह के आयोजकों ने की थी. जिस होटल में मैं बाकी गेस्ट्स के साथ ठहरी थी, वो अवॉर्ड समारोह के आयोजकों का पार्टनर था. मेरे ई-मेल में अब भी इससे जुड़े डॉक्यूमेंट्स मौजूद हैं.
मेरा परिवार इकबाल (2005 में आई श्वेता की फिल्म) के बाद से नहीं चाहता कि मैं फिल्मों में काम करूं. मेरे परिवार को इस बात की ज्यादा परवाह थी कि मैं 10वीं और 12वीं की परिक्षांए अच्छे से पास कर लूं, न कि 16 की उम्र में फिल्में करने लग जाउं! मेरे घर वालों ने मेरी परवरिश के लिए बड़ी मेहनत की है. मुझे बहुत अच्छी शिक्षा दिलाई, जन्मदिन पर अच्छे तोहफे दिए, अच्छी जगहों पर घूमने ले गए, यहां तक कि खेल से लेकर संगीत तक सीखने की सुविधाएं दिलावाईं (मैंने मुंबई स्थित जुहू के संगीत महाभारती से सितार बजाना सीखा है), मेरे परिवार ने वो सबकुछ किया जो एक मिडिल क्लास परिवार करता है.
जब मैं 18 की थी तो मैंने कुछ साउथ की फिल्में (तमिल और तेलगू) कीं, फिर पिछले साढ़े तीन सालों से मैं एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाने में व्यस्त थी. फिल्म का नाम ‘रूट्स’ है और यह फिल्म भारतीय शास्त्रीय संगीत पर आधारित है, इसमें उस्ताद अमजद अली खान, पंडित शिवकुमार शर्मा, शुभा मुगदल, ए आर रहमान, विशाल भारद्वाज, डॉ. एल अधिरजा बोस के इंटरव्यू शामिल हैं.
जून 2014 में मैंने अपने एक दोस्त अधिराज बोस के साथ मिल कर 12 मिनट की एक फिल्म बनाई. फिल्म का नाम ‘INT. cafe night’ है. फिल्म में मेरे साथ शेरनाज पटेल, नसीरुद्दीन शाह और नवीन कस्तूरिया भी हैं. इसे कई फिल्म फेस्टिवल्स में दिखाया जा रहा है. मैंने कई फिल्मों के ऑडिशन्स भी दिए हैं. तो कौन से दरवाजे मेरे लिए बंद थे? कृपा करके कोई निष्कर्ष निकालने के पहले एक बार अपने तथ्य ठीक कर लें!
हालांकि, 5 दिस्मबर 2014 को हैदराबाद स्थित नामपल्ली के मेट्रोपॉलिटन सेशन कोर्ट ने मुझे इस मामले में क्लीन चिट दे दी है और मुझ पर से सभी आरोप हटा लिए, साथ ही ट्रायल कोर्ट द्वारा मुझ पर लगाया गया स्टे ऑर्डर भी हटा लिया.
उन सबको जिन्होंने इस दौरान मेरा साथ दिया, बहुत-बहुत शुक्रिया. चलिए, बहुत कुछ कह दिया और सुन लिया. मैं पूरी तरह से इस घटना से उबर चुकी हूं और उन सबको भी याद नहीं करना चाहती जिन्होंने गलत बयान (बयानों) पर आधारित ख़बरें बनाई. मैं इसे भूल गई क्योंकि इस मुद्दे को अब और महत्व नहीं दिया जाना चाहिए.
श्वेता बासु प्रसाद
बचपन से ही कुछ महान पत्रकारों के प्रति मेरे मन में आदर का भाव रहा है, ये वो पत्रकार है जिन्होंने युद्ध के मैदान, आतंकी हमले और प्राकृतिक आपदा जैसी परिस्थितियों में डटे रहकर, अपनी जान की बाजी लगाकर सीधे सच हम तक पहुंचाया है. ऐसे ही लोगों से प्रभावित होकर मैंने बिना किसी हिचकिचाहट के मास कॉम (जनसंचार) और पत्रकारिता की डिग्री हासिल की. मुझे हमेशा इस बात से (मास कॉम और पत्रकारिता की डिग्री हासिल करने से) खुशी मिलती थी! मैं सोचती थी कि मीडिया के लोग अपनी जिंदगी दांव पर लगाकर लोगों तक सच पहुंचाते हैं. पर ये क्या! एक दिन अचानक इसी मीडिया ने मेरी जिंदगी में भूचाल ला दिया. बहुत-बहुत शुक्रिया!
मुझे यह पता है कि सब कुछ प्रतिक्रियाओं पर आधारित था और इसी दरम्यान कई सारी गलत ख़बर बना दी गईं. साथ में मेरा...इंतजार, पर मेरे बयान का इंतजार नहीं किया गया.
“मैंने अपने करियर में गलत फैसले किए हैं और मेरे पास पैसे नहीं है. मुझे अपने परिवार को चलाना पड़ता है और कई अच्छे काम भी करने पड़ते हैं. सभी दरवाजे बंद हो गए थे और कुछ लोगों ने मुझे वेश्याव़ति अपनाने की सलाह दी. मेरे पास कोई चारा नहीं था. कोई और विकल्प नहीं होने के कारण, मैं इस काम में शामिल हो गई. मैं अकेली नहीं हूं, जिसे इस दिक्कत का सामना करना पड़ा है और कई सारी ऐसी हीरोइनें हैं जो इस दौर से गुजरी हैं.”
सच में?? आप जो कोई भी हैं, किसने इस बयान की कल्पना की और इसे लिखा, क्या आप काम करते वक्त सिगरेट के नशे में थे? कौन ऐसी बातें करता है? ये बयान 80 के दशक में बनी किसी बॉलीबुड फिल्म का लगता है. साथ ही इस बयान में इतने सारे ‘और’ जोड़ने की क्या जरूरत थी, स्कूल जाकर अपनी भाषा पर मेहनत करो वेबकूफ! शुक्र है कि मेरे परिवार, मेरे दोस्तों और जो लोग मुझे जानते हैं उन्होंने इस बयान पर भरोसा नहीं किया. उन्हें पता है कि मैं ऐसी बात नहीं करती हूं. पर भारत और बाकी लोगों के लिए, चाहे पूरी दुनिया में वे कहीं भी हो, आखिरी बार: ये मेरा बयान नहीं है (जो मीडिया ने लोगों तक पहुंचाया).
हमारे समाज के साथ जो दिक्कत है वो यह है कि जब तक मुझे सहानुभूति मिल रही थी सब मेरा साथ दे रहे थे. जैसी ही लोगों को लगा कि वो (मीडिया में आई ख़बरों से) बहक गए थे और 23 साल की एक लड़की बिना किसी सहानुभूति के अपने कदमों पर खड़ी हो सकती है, समाज को लगा कि वो झूठ बोल रही है? इसमें मेरी क्या गलती है कि मीडिया के काम करने का यही तरीका है. मैं किसी पर इस बात का दबाव नहीं डाल सकती कि वे मुझे पसंद या मेरी इज्जत करें. जो हुआ, खुद-ब-खुद हुआ. जो हुआ वो मेरे नियंत्रण से बाहर था.
मेरी गिरफ्तारी के बाद मुझे सुधार गृह भेज दिया गया जहां मुझे साढ़े 59 दिन बिताने पड़े. (60वें दिन मैं घर लौटी), इस बीच मैंने मीडिया को कब और कैसे बयान दे दिया? मेरा फोन जब्त कर लिया गया था, मैंने कुछ आखिरी कॉल्स मेरी मां और मेरे करीबी दोस्तों को किया. ये दो महीने मैं अख़बार, टीवी, इंटरनेट और रेडियो जैसे किसी माध्यम से महरूम थी. प्रज्वला सुधार गृह के बाहर क्या चल रहा था इसका मुझे कोई पता नहीं था. हां, वहां मेरा वक्त बड़ा अच्छा गुजरा. मैंने वहां बच्चों को हिंदी, अंग्रेजी और हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत सिखाया. मैं हमेशा उन बच्चों के लिए प्रर्थना करुंगी. मैंने उन दो महीनों में 12 किताबें खत्म कीं. मैंने इस दौरान बहुत कुछ सीखा.
30 अक्टूबर 2014 को जब दो महीने बाद मैं बाहर आई तो पिछले दो महीनों में मेरे बारे में फैलाई गई ख़बरों का मुझे पता चला, मुझे दुख की जगह हैरानी हुई! एक ख़बर में लिखा गया था कि पुलिस वालों ने (मीडिया को) यह बताया कि मैंने ऐसा बयान दिया है पर जब मैंने हैदराबाद संपर्क किया तो पुलिस ने ऐसी किसी बात से इनकार कर दिया. एक बात और कि ऐसे मामलों में पुलिस के पास आरोपी की पहचान बताने का अधिकार नहीं होता है, जिससे ये बात साफ होती है कि पुलिस ने ऐसा कोई बयान नहीं दिया. ऐसा करना कानून के खिलाफ है. पुलिस ऐसा कैसे कर सकती है, जब ऐसा कोई बयान मौजूद ही नहीं है. मेरी गैरमौजूदगी, मेरे बयान गढ़ने वालों के लिए एक मौका बन गई.
मेरी जिंदगी में ये बिजनेसमैन कौन हैं, कोई बताएगा? मैं भी उतनी ही हैरान हूं जितना बाकी लोग! तो पहेली यहां सुलझती है: मेरे साथ पकड़े गए व्यापारी का नाम क्यों सार्वजनिक नहीं किया गया? एक क्लू: जब मेरी गिरफ्तारी हुई थी तब क्या वहां कोई बिजनेसमैन मौजूद भी था? जरा सोचिए. इस बात को सच साबित कर के दिखाइए!
30 अगस्त को होने वाले संतोषम अवॉर्ड्स के सिलसिले में मैं हैदराबाद में थी. मुझे कभी किसी ने वेश्याव़ति में आने की सलाह नहीं दी और मेरा टिकट किसी ने बुक नहीं किया, न ही वहां कोई मौजूद था! मेरा टिकट और रहने की व्यवस्था समारोह के आयोजकों ने की थी. जिस होटल में मैं बाकी गेस्ट्स के साथ ठहरी थी, वो अवॉर्ड समारोह के आयोजकों का पार्टनर था. मेरे ई-मेल में अब भी इससे जुड़े डॉक्यूमेंट्स मौजूद हैं.
मेरा परिवार इकबाल (2005 में आई श्वेता की फिल्म) के बाद से नहीं चाहता कि मैं फिल्मों में काम करूं. मेरे परिवार को इस बात की ज्यादा परवाह थी कि मैं 10वीं और 12वीं की परिक्षांए अच्छे से पास कर लूं, न कि 16 की उम्र में फिल्में करने लग जाउं! मेरे घर वालों ने मेरी परवरिश के लिए बड़ी मेहनत की है. मुझे बहुत अच्छी शिक्षा दिलाई, जन्मदिन पर अच्छे तोहफे दिए, अच्छी जगहों पर घूमने ले गए, यहां तक कि खेल से लेकर संगीत तक सीखने की सुविधाएं दिलावाईं (मैंने मुंबई स्थित जुहू के संगीत महाभारती से सितार बजाना सीखा है), मेरे परिवार ने वो सबकुछ किया जो एक मिडिल क्लास परिवार करता है.
जब मैं 18 की थी तो मैंने कुछ साउथ की फिल्में (तमिल और तेलगू) कीं, फिर पिछले साढ़े तीन सालों से मैं एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाने में व्यस्त थी. फिल्म का नाम ‘रूट्स’ है और यह फिल्म भारतीय शास्त्रीय संगीत पर आधारित है, इसमें उस्ताद अमजद अली खान, पंडित शिवकुमार शर्मा, शुभा मुगदल, ए आर रहमान, विशाल भारद्वाज, डॉ. एल अधिरजा बोस के इंटरव्यू शामिल हैं.
जून 2014 में मैंने अपने एक दोस्त अधिराज बोस के साथ मिल कर 12 मिनट की एक फिल्म बनाई. फिल्म का नाम ‘INT. cafe night’ है. फिल्म में मेरे साथ शेरनाज पटेल, नसीरुद्दीन शाह और नवीन कस्तूरिया भी हैं. इसे कई फिल्म फेस्टिवल्स में दिखाया जा रहा है. मैंने कई फिल्मों के ऑडिशन्स भी दिए हैं. तो कौन से दरवाजे मेरे लिए बंद थे? कृपा करके कोई निष्कर्ष निकालने के पहले एक बार अपने तथ्य ठीक कर लें!
हालांकि, 5 दिस्मबर 2014 को हैदराबाद स्थित नामपल्ली के मेट्रोपॉलिटन सेशन कोर्ट ने मुझे इस मामले में क्लीन चिट दे दी है और मुझ पर से सभी आरोप हटा लिए, साथ ही ट्रायल कोर्ट द्वारा मुझ पर लगाया गया स्टे ऑर्डर भी हटा लिया.
उन सबको जिन्होंने इस दौरान मेरा साथ दिया, बहुत-बहुत शुक्रिया. चलिए, बहुत कुछ कह दिया और सुन लिया. मैं पूरी तरह से इस घटना से उबर चुकी हूं और उन सबको भी याद नहीं करना चाहती जिन्होंने गलत बयान (बयानों) पर आधारित ख़बरें बनाई. मैं इसे भूल गई क्योंकि इस मुद्दे को अब और महत्व नहीं दिया जाना चाहिए.
श्वेता बासु प्रसाद

