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एक खुला ख़त उन तमाम लड़कों के नाम जो अरस्तु बनने के चक्कर में 'चौकीदार' बन बैठे !

-रिज़वान शाहिद

हर लड़के में एक "अरस्तु" छुपा होता है और वो निकल कर सामने तब आता है, जब उसकी किसी लड़की से दोस्ती होती है....आप समझ रहे हैं न मैं क्या कहना चाहता हूं? या फिर अभी तक आप खुद को रिलेट भी कर चुके हैं...अगर आप लड़के हैं तो यक़ीनन लाइफ में एक बार "अरस्तु" बनने का सौभाग्य ज़रूर प्राप्त हुआ होगा.....और अगर लड़की हैं तो अरस्तु द्वारा दिया गया वो 'ज्ञान' ज़रूर प्राप्त हुआ होगा, लेकिन आपके किसी काम नहीं आया होगा, सिवाए टाइम पास करने के.
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"ज़िन्दगी न, एक हसीन एहसास है, आप उतना ही खुश रहते हैं जितना रहना चाहते हैं", "तुम्हें क्या लगता है, इस साल प्रोफेसर गुप्ता ही पेपर सेट करेंगे, नहीं...पेपर कहीं और से बन कर आएगा", "डांटने भर से कुछ नहीं होता, एक्चुअली आंटी तुमसे बहुत प्यार करती हैं, तुम्हारी फ़िक़्र है उन्हें", "मुझे ये रवि लड़का ठीक नहीं लगता, अभी तुम्हें अंदाज़ा नहीं है कितना ख़तरनाक इंसान है वो...घुन्ना है", तुम बहुत सीधी हो, बहुत जल्दी लोगों पर विश्वास कर लेती हो", "बाक़ी रिश्ते तो ऊपर से बन कर आते हैं, लेकिन दोस्ती एक ऐसा रिश्ता है जो हम खुद अपनी मर्ज़ी से बनाते हैं...हम दोस्त खुद चुनते हैं "...बस...बस!! यहीं अरस्तु ग़लती कर देता है, जिस मक़सद से ज्ञानी बन कर हर विषय में रोज़ ज्ञान देता है, अपने किए धरे पर इसी वाक्य से पानी फेर देता है. और हमेशा के लिए "दोस्त" बनकर ही रह जाता है.

उसी दिन से लड़की को उसमें एक बुद्धिजीवी नज़र आने लगता है...एक ऐसा दोस्त जो हर विषय में जानकारी रखता है, अच्छी सलाह देता है, रोते वक़्त अपने कंधे को आगे बढ़ाता है, और दुनियां भर की बुराइयों और आपदाओं से सुरक्षित करता है. सहज अल्फ़ाज़ में कहें तो "बॉडीगॉर्ड". इससे भी आसान शब्दों में कहें तो "चौकीदार".

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बताइये साहब शुरुआत अरस्तू से हुई थी और बन गए चौकीदार....तो भैय्या किसने कहा था इतना ज्ञान देने को, अरस्तु बनने को, यार अरस्तु अपने ज़माने का बुद्धिजीवी था, वैज्ञानिक था...तो तुम काहे उसको आदर्श बना कर मजनू बनने चले थे...आप क्लियर ही नहीं हैं अपने मिशन में. यार चाहिए था उसको शाहरुख़ खान और आपकी हरकतें हैं "हम आपके हैं कौन" के मोहनीश बहल जैसी तो कैसे "डीडीएलजे" बनेगी, ख़ैर छोडो यार तुमसे नहीं हो पाएगा....तुमने अपनी क़ब्र खुद खोदी है...ख़ैर जाने दो...अब तो तुम तैयारी करो उस जुमले को सुनने की..."मैंने तुम्हें कभी उस नज़र से देखा ही नहीं" इस चिठ्ठी को लिखने का मक़सद किसी की भावनाएं आहत करना नहीं, बल्कि सूरत-ए-हाल से वाक़िफ़ करना भर था.

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