झारखंड सरकार ने पत्थलगड़ी मामले में जन विकास आंदोलन के संस्थापक और सामाजिक कार्यकर्ता फादर स्टेन स्वामी के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा दर्ज किया है. पुलिस का आरोप है कि स्टेन स्वामी ने ग्रामीणों को भड़काकर देश विरोधी गतिविधियों के लिए उकसाया. स्टेन स्वामी ने अपने उपर लगे देशद्रोह के मुकदमे के खिलाफ एक चिट्ठी जारी की है. स्टेन स्वामी ने अपनी चिट्ठी में सफाई दी है कि वो आदिवासियों के हित में और विस्थापन के खिलाफ मुहिम चला रहे हैं. उन्होंने कभी भी देश के खिलाफ कोई बात नहीं कही, हां व्यवस्था के खिलाफ उनकी लड़ाई जारी है और वे गरीबों के हित में अपनी लड़ाई जारी रखेंगे.
-फादर स्टेन स्वामी
पुलिस ने मुझ पर फेसबुक पोस्ट के माध्यम से आदिवासियों को भड़काने का आरोप लगाया है. पिछले दो दशकों से मैं आदिवासियों के संघर्ष में उनके साथ रहा हूं. बड़े कॉरपोरेट घरानों के द्वारा गरीबों की जमीन के अधिग्रहण के खिलाफ मैंने हमेशा आवाज बुलंद की है. मैंने सरकार के क्रियाकलापों पर सवाल खड़े किए हैं. क्या यही देशद्रोह है? मैं सरकार से सवाल कर रहा हूं. अगर सरकार इन सवालों का लही-सही जवाब दे तो मैं अपने ऊपर लगे आरोपों को सही मान लूंगा.
पहला सवाल- जनजातीय क्षेत्रों में पांचवी अनुसूची (5th Schedule) लागू क्यों नहीं ?
सरकार जनजातीय क्षेत्रों में पांचवी अनुसूची (5th Schedule) लागू क्यों नहीं कर रही? संविधान का अनुच्छेद 244 (1) कहता है कि जनजातीय परामर्शदाता परिषद (Tribes Advisory Council, TAC) में सिर्फ आदिवासी समुदाय के लोग ही होंगे. क्या झारखंड में इस मुद्दे पर संविधान का उल्लंघन नहीं हो रहा ?
दूसरा सवाल- पेसा एक्ट, 1996 का उल्लंघन क्यों ?
पेसा कानून आदिवासी समुदाय की प्रथागत, धार्मिक एवं परंपरागत रीतियों के संरक्षण पर जोर देता है. कानून की धारा 4 अ एवं 4 द निर्देश देती है कि किसी राज्य की पंचायत से संबंधित कोई विधि, उनके प्रथागत कानून, सामाजिक एवं धार्मिक रीतियों तथा सामुदायिक संसाधनों के परंपरागत प्रबंध व्यवहारों के अनुरूप होगी. प्रत्येक ग्राम सभा लोगों की परंपराओं एवं प्रथाओं के संरक्षण, उनकी सांस्कृतिक पहचान, सामुदायिक संसाधनों एवं विवादों को प्रथागत ढंग से निपटाने में सक्षम होंगी. क्या सरकार ने झारखंड में पेसा कानून की आत्मा को नहीं मारा? नये पंचायत प्रतिनिधि पेसा कानून के तहत बने हैं?
तीसरा सवाल- सरकार सुप्रीम कोर्ट के समता जजमेंट 1997 पर खामोश क्यों?
यह न्यायादेश आंध्र प्रदेश से संबंधित है. जुलाई 1997 में आए फैसले के तहत कोर्ट ने स्पष्ट कहा था कि आदिवासी जमीन को लीज पर देने अथवा अधिग्रहण के बाद संबंधित कंपनी को होने वाले कुल लाभ का 20 फीसदी हिस्सा पर्यावरण संतुलन और क्षेत्रीय विकास पर खर्च करने की बाध्यता होगी, वहीं विस्थापितों के बेहतर पुनर्वास की जवाबदेही सरकार की होगी. सरकार सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का उल्लंघन क्यों कर रही है?
चौथा सवाल- वनाधिकार कानून 2006 को अधूरे मन से लागू क्यों कर रही है सरकार?
कानून के अनुसार 13 दिसंबर, 2005 से पूर्व वन भूमि पर काबिज अनुसूचित जनजाति के सभी समुदायों को वनों में रहने और आजीविका का अधिकार मिला है. क्या झारखंड सरकार ने ग्राम सभा को बाइपास कर उद्योगपतियों को जमीन नहीं मुहैया करवाई? 2006 से 2011 तक देश की अदालतों में जमीन के मालिकाना हक से जुड़े 30 लाख मामले आए. इनमें से 11 लाख मामलों को कोर्ट ने स्वीकार कर लिया जबकि 15 लाख मामले खारिज कर दिए गये. पांच लाख मामले पेंडिंग हैं.
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सुधा भारद्वाज की बेटी मायशा की चिट्ठी, मां को बोलते हैं कि नक्सली है, लोग पागल हो चुके हैं
सुप्रीम कोर्ट ने 2000 में एक महत्वपूर्ण फैसला दिया था. सुप्रीम कोर्ट (SC: Civil Appeal No 4549 of 2000) में जस्टिस आर एम लोढ़ा की अगुवाई में तीन सदस्यीय पीठ ने अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि जमीन मालिक ही जमीन में पाए जाने वाले खनिजों का मालिक होगा. क्या झारखंड सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले का अक्षरशः पालन कर रही है ? अगर हां, तो फिर सरकार खनिजों की नीलामी कर कंपनियों को कैसे खनन का अधिकार दे सकती है.
किसी प्रतिबंधित संगठन का मेंबर होना आपको क्रिमिनल साबित नहीं कर देता. हजारों लोग नक्सली समर्थक होने के आरोप में जेल में बंद हैं. उनकी जमानत कराने वाला कोई नहीं है. क्या ऐसे लोगों के लिए आवाज उठाना देशद्रोह है? झारखंड सरकार के भूमि संशोधन बिल का तमाम विपक्षी दल भी विरोध कर रहे हैं. वे इस संशोधन को आदिवासी और मूलवासी समाज के लिए घातक मानते हैं. क्या इस कानून का विरोध करना उनको देशद्रोही साबित करता है? अगर हां, तो मैं देशद्रोही हूं.
-फादर स्टेन स्वामी
पुलिस ने मुझ पर फेसबुक पोस्ट के माध्यम से आदिवासियों को भड़काने का आरोप लगाया है. पिछले दो दशकों से मैं आदिवासियों के संघर्ष में उनके साथ रहा हूं. बड़े कॉरपोरेट घरानों के द्वारा गरीबों की जमीन के अधिग्रहण के खिलाफ मैंने हमेशा आवाज बुलंद की है. मैंने सरकार के क्रियाकलापों पर सवाल खड़े किए हैं. क्या यही देशद्रोह है? मैं सरकार से सवाल कर रहा हूं. अगर सरकार इन सवालों का लही-सही जवाब दे तो मैं अपने ऊपर लगे आरोपों को सही मान लूंगा.
पहला सवाल- जनजातीय क्षेत्रों में पांचवी अनुसूची (5th Schedule) लागू क्यों नहीं ?
सरकार जनजातीय क्षेत्रों में पांचवी अनुसूची (5th Schedule) लागू क्यों नहीं कर रही? संविधान का अनुच्छेद 244 (1) कहता है कि जनजातीय परामर्शदाता परिषद (Tribes Advisory Council, TAC) में सिर्फ आदिवासी समुदाय के लोग ही होंगे. क्या झारखंड में इस मुद्दे पर संविधान का उल्लंघन नहीं हो रहा ?
दूसरा सवाल- पेसा एक्ट, 1996 का उल्लंघन क्यों ?
पेसा कानून आदिवासी समुदाय की प्रथागत, धार्मिक एवं परंपरागत रीतियों के संरक्षण पर जोर देता है. कानून की धारा 4 अ एवं 4 द निर्देश देती है कि किसी राज्य की पंचायत से संबंधित कोई विधि, उनके प्रथागत कानून, सामाजिक एवं धार्मिक रीतियों तथा सामुदायिक संसाधनों के परंपरागत प्रबंध व्यवहारों के अनुरूप होगी. प्रत्येक ग्राम सभा लोगों की परंपराओं एवं प्रथाओं के संरक्षण, उनकी सांस्कृतिक पहचान, सामुदायिक संसाधनों एवं विवादों को प्रथागत ढंग से निपटाने में सक्षम होंगी. क्या सरकार ने झारखंड में पेसा कानून की आत्मा को नहीं मारा? नये पंचायत प्रतिनिधि पेसा कानून के तहत बने हैं?
तीसरा सवाल- सरकार सुप्रीम कोर्ट के समता जजमेंट 1997 पर खामोश क्यों?
यह न्यायादेश आंध्र प्रदेश से संबंधित है. जुलाई 1997 में आए फैसले के तहत कोर्ट ने स्पष्ट कहा था कि आदिवासी जमीन को लीज पर देने अथवा अधिग्रहण के बाद संबंधित कंपनी को होने वाले कुल लाभ का 20 फीसदी हिस्सा पर्यावरण संतुलन और क्षेत्रीय विकास पर खर्च करने की बाध्यता होगी, वहीं विस्थापितों के बेहतर पुनर्वास की जवाबदेही सरकार की होगी. सरकार सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का उल्लंघन क्यों कर रही है?
चौथा सवाल- वनाधिकार कानून 2006 को अधूरे मन से लागू क्यों कर रही है सरकार?
कानून के अनुसार 13 दिसंबर, 2005 से पूर्व वन भूमि पर काबिज अनुसूचित जनजाति के सभी समुदायों को वनों में रहने और आजीविका का अधिकार मिला है. क्या झारखंड सरकार ने ग्राम सभा को बाइपास कर उद्योगपतियों को जमीन नहीं मुहैया करवाई? 2006 से 2011 तक देश की अदालतों में जमीन के मालिकाना हक से जुड़े 30 लाख मामले आए. इनमें से 11 लाख मामलों को कोर्ट ने स्वीकार कर लिया जबकि 15 लाख मामले खारिज कर दिए गये. पांच लाख मामले पेंडिंग हैं.
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किसी प्रतिबंधित संगठन का मेंबर होना आपको क्रिमिनल साबित नहीं कर देता. हजारों लोग नक्सली समर्थक होने के आरोप में जेल में बंद हैं. उनकी जमानत कराने वाला कोई नहीं है. क्या ऐसे लोगों के लिए आवाज उठाना देशद्रोह है? झारखंड सरकार के भूमि संशोधन बिल का तमाम विपक्षी दल भी विरोध कर रहे हैं. वे इस संशोधन को आदिवासी और मूलवासी समाज के लिए घातक मानते हैं. क्या इस कानून का विरोध करना उनको देशद्रोही साबित करता है? अगर हां, तो मैं देशद्रोही हूं.
