-आशीष महर्षि
मोदीजी प्रणाम,
आपने कुछ किया या नहीं, पता नहीं। लेकिन आपने देश के कई पत्रकारों के फेस से नकाब हटा दिया। ये पत्रकार हर पल सरकार को खुश करने के लिए अलग अलग अदा दिखाते रहते हैं। नाम नहीं लूंगा। क्योंकि ऐसे पत्रकार भोपाल से लेकर दिल्ली तक में भरे हुए हैं। जिनके लिए पत्रकारिता का मतलब केवल चाटना ही है। जबकि पत्रकार का काम होता है सत्ता से ऐसे सवाल करना, जिसे वो बैचेन हो जाए। लेकिन इन दिनों ऐसे पत्रकारों की जमात बहुत तेजी से कम हो रही है। हर कोई आपके लिए चारणगान में मशगूल है। इसमें आपका बिलकुल भी दोष नहीं है। क्योंकि बिकता वही है जो बिकना चाहे।
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सबसे हंसी की बात ये है कि जो पत्रकार आपको खुश करने के लिए राष्ट्रवाद, भारत माता और हिंदुस्तान की जय बोलते हैं, उसमें से ज्यादातर नैतिक और आर्थिक रुप से करप्ट हैं। ये कोई आरोप नहीं, बल्कि दावा है। चूंकि मैं भी इस जमात से आता हूं तो मुझे इनकी असलियत अच्छे से पता है। कोई प्रेस नोट के साथ नोट मांगता है तो कोई जनसंपर्क से छोटी छोटी सुविधाओं के लिए गुहार लगाता है। अब ऐसे पत्रकारों से आप और हम क्या उम्मीद कर सकते हैं?
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मोदीजी मैं भी इन चारण पत्रकारों की तरह बनना चाहता हूं। क्योंकि इस मुल्क में ईमानदारी की कोई कीमत नहीं है। लेकिन साला क्या करुं? खून इजाजत नहीं देता है। इसलिए जब तक मैं इन चारण पत्रकारों की तरह नहीं बन जाता, तब तक ऐसे दलालों पर सवाल उठाता रहूंगा। मुझे पता है कि जो ईमानदार पत्रकार हैं, उन्हें मेरी बातें नहीं चुभेंगी। लेकिन जो करप्ट हैं, दलाल हैं, सत्ता के भौंपू हैं, वो क्रोधित होंगे। हालांकि, मुझे इनसे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। क्योंकि सबसे बड़ा रोग, क्या कहेंगे लोग?
राम राम
