- रवींद्र रंजन
तुम अकेले थे या दो-तीन की संख्या में थे, मैं नही जानता। तुम्हारा और तुम्हारे साथियों का नाम भी नहीं जानता। चेहरा भी नहीं पहचानता। लेकिन जब से तुम्हारी इस हरकत के बारे में पढ़ा है, सुना है तब से ही मन कुछ अजीब सा है। दिल कहता है कि यह सच नहीं हो सकता। लेकिन दिमाग बार-बार सच को स्वीकार करने पर जोर देता है। सोचकर हैरान हूं कि कोई इंसान इतना बेदर्द, स्वार्थी और लालची कैसे हो सकता है कि उसे सड़क पर पड़े एक इंसान की चीखों की जगह उसकी जेब में पड़े पैसों की खनक सुनाई दें। सड़क पर खून से लथपथ पड़ा उसका तड़पता जिस्म भी न दिखाई दे? क्या वह व्यक्ति इंसान कहलाने लायक भी है, जो मदद की गुहार लगा रहे किसी घायल को अस्पताल पहुंचाने की बजाय उसकी जेबें टटोलने लगे? घायल इंसान की जेब से पैसे निकालकर उसे मरने के लिए छोड़कर भाग निकले।
मुमकिन है ऎसी हरकत करने वाला पेशे से ही चोर-बदमाश हो। ये भी मुमकिन है कि उसकी परवरिश सही माहौल में न हुई हो। वो कभी स्कूल न गया हो। नैतिक शिक्षा का पाठ न पढ़ा हो। लेकिन मुश्किल में मदद करना तो इंसान की कुदरती खासियत है। इसे सीखने के लिए किसी किताब या स्कूल-कॉलेज की जरूरत शायद नहीं है। फिर वो भला इससे महरूम कैसे रह गया? उसने इंसानियत का पाठ नहीं पढ़ा, लेकिन लालच का सबक कहां से सीख लिया? वैसे तो लालच भी इंसान की कुदरती विशेषता है। लेकिन उत्तर प्रदेश के बरेली में जो हुआ वो तो इंसानियत को शर्मसार करने वाला है। समाज पर एक बदनुमा दाग है।
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मां, यह शहर लगभग बीमार हो चुके लोगों की रचना है !
मगर तुम्हें इंसानियत और समाज की परवाह भला क्यों होगी? हो सकता है तुम मरते हुए इंसान की जेब से 35 हजार रुपये निकालकर वहां से सफलतापूर्वक भाग निकलने को अपनी बड़ी कामयाबी मान रहे हो। अगर तुम्हारे पक्ष में सोचूं तो हो सकता है उन 35 हजार रुपयों की तुम्हें उस किसान से ज्यादा जरूरत रही हो। लेकिन नेशनल हाइवे पर सड़क हादसे के शिकार हुए इंसान को तुम बचा सकते थे। शायद तुम्हारी जगह कोई और होता तो उसे समय रहते अस्पताल पहुंचा देता और उस किसान की जान शायद बच जाती। तुम और तुम्हारे साथी भी तो उसे अस्पताल पहुंचा सकते थे। उसकी जेब से पैसे निकालने थे तो निकाल लेते, लेकिन उन 35 हजार के बदले में ही सही, उसकी जान बचाने की कोशिश तो करते। इंसानियत के नाते ऎसा करने के लिए नहीं कहूंगा। क्योंकि तुमने जो किया उसकी उम्मीद एक इंसान से नहीं की जा सकती।
तुम्हारे इस कृत्य का शायद किसी को पता भी नहीं चलता। वो किसान तो मर गया। लेकिन तुम्हें और तुम्हारे साथियों को शायद बगल में ही घायल पड़ा उसका चचेरा भाई नज़र नहीं आया? शुक्र इस बात का है कि तुम्हारी बेरुखी और लालच के बावजूद वो बच गया। तुमने सोचा होगा कि बरेली-लखनऊ नेशनल हाइवे पर रोजाना सैकड़ों-हजारों वाहन दौड़ते हैं। बीसियों हादसे होते हैं। किसी को तुम्हारे लिजलिजेपन का पता नहीं चलेगा। लेकिन पुलिस के अस्पताल पहुंचाने से बच गये किसान के चचेरे भाई ने तुम्हारी शर्मसार करने वाली करतूत को दुनिया के सामने ला दिया।
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सच कहूं तो तुम उस तेज रफ्तार वाहन के ड्राइवर से कहीं ज्यादा बड़े गुनहगार हो, जो उस किसान को टक्कर मारकर भाग निकला। वो तो पुलिस और सजा के डर से नहीं रुका होगा। तुम तो हादसा देखकर रुके भी और घायल पड़े दो इंसानों के पास भी पहुंचे। लेकिन उनकी मदद करने के लिए नहीं, बल्कि जेबें टटोलने के लिए। सोचता हूं, वो कैसा मंजर रहा होगा, जब दो इंसान दर्द से कराह रहे होंगे और कुछ लोग उनकी जेबों की तलाशी लेने में जुटे होंगे। 35 हजार पाकर तो तुम्हें ऐसा लग रहा होगा जैसे कोई खजाना हाथ लग गया हो?
वो किसान तो 35 हजार रुपये लेकर भैंस खरीदने निकला था। तुम उन 35 हजार से क्या खरीदोगे? महंगे कपड़े, पत्नी के लिए गहने, परिवार के लिए जमीन? जायदाद, लेकिन क्या उन 35 हजार से किसी की जिंदगी खरीद सकते हो? नहीं खरीद सकते। लेकिन उन 35 हजार का लालच मन में नहीं आया होता तो तुम एक जिंदगी बचा जरूर सकते थे। कहते हैं जिंदगी अनमोल है। भला एक जिंदगी के सामने 35 हजार की क्या बिसात? लेकिन तुम जिंदगी की अहमियत क्या जानो? वक्त न करे कि भविष्य में ऐसा कुछ तुम्हारे किसी अपने के साथ हो। लेकिन जिंदगी की अहमियत का अहसास तुम्हें तभी होगा जब तुम किसी अपने को दर्द से तड़पता देखोगे। उसक टीस को महसूस करोगे।
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हो सकता है पुलिस तुम तक और तुम्हारे साथियों तक कभी न पहुंच सके। लेकिन उस किसान की चीखें, उसके परिवार की आहें तुम्हारें कानों तक हमेशा पहुंचती रहेगी। आज नहीं तो कल उस किसान का परिवार इस हादसे से उबर जाएगा। उसकी पत्नी इस हादसे को अपनी नियति मान लेगी। बच्चे धीरे-धीरे पिता की मौत को भूलकर सामान्य जिंदगी जीने लगेंगे। लेकिन यकीन मानो तुम अपनी इस करनी को कभी नहीं भूल सकोगे। उठते-बैठते-जागते-सोते दर्द से कहारते उस किसान का चेहरा तुमसे बार-बार सवाल करता रहेगा। बताओ मेरा कसूर क्या था?
तुम अकेले थे या दो-तीन की संख्या में थे, मैं नही जानता। तुम्हारा और तुम्हारे साथियों का नाम भी नहीं जानता। चेहरा भी नहीं पहचानता। लेकिन जब से तुम्हारी इस हरकत के बारे में पढ़ा है, सुना है तब से ही मन कुछ अजीब सा है। दिल कहता है कि यह सच नहीं हो सकता। लेकिन दिमाग बार-बार सच को स्वीकार करने पर जोर देता है। सोचकर हैरान हूं कि कोई इंसान इतना बेदर्द, स्वार्थी और लालची कैसे हो सकता है कि उसे सड़क पर पड़े एक इंसान की चीखों की जगह उसकी जेब में पड़े पैसों की खनक सुनाई दें। सड़क पर खून से लथपथ पड़ा उसका तड़पता जिस्म भी न दिखाई दे? क्या वह व्यक्ति इंसान कहलाने लायक भी है, जो मदद की गुहार लगा रहे किसी घायल को अस्पताल पहुंचाने की बजाय उसकी जेबें टटोलने लगे? घायल इंसान की जेब से पैसे निकालकर उसे मरने के लिए छोड़कर भाग निकले।
मुमकिन है ऎसी हरकत करने वाला पेशे से ही चोर-बदमाश हो। ये भी मुमकिन है कि उसकी परवरिश सही माहौल में न हुई हो। वो कभी स्कूल न गया हो। नैतिक शिक्षा का पाठ न पढ़ा हो। लेकिन मुश्किल में मदद करना तो इंसान की कुदरती खासियत है। इसे सीखने के लिए किसी किताब या स्कूल-कॉलेज की जरूरत शायद नहीं है। फिर वो भला इससे महरूम कैसे रह गया? उसने इंसानियत का पाठ नहीं पढ़ा, लेकिन लालच का सबक कहां से सीख लिया? वैसे तो लालच भी इंसान की कुदरती विशेषता है। लेकिन उत्तर प्रदेश के बरेली में जो हुआ वो तो इंसानियत को शर्मसार करने वाला है। समाज पर एक बदनुमा दाग है।
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तुम्हारे इस कृत्य का शायद किसी को पता भी नहीं चलता। वो किसान तो मर गया। लेकिन तुम्हें और तुम्हारे साथियों को शायद बगल में ही घायल पड़ा उसका चचेरा भाई नज़र नहीं आया? शुक्र इस बात का है कि तुम्हारी बेरुखी और लालच के बावजूद वो बच गया। तुमने सोचा होगा कि बरेली-लखनऊ नेशनल हाइवे पर रोजाना सैकड़ों-हजारों वाहन दौड़ते हैं। बीसियों हादसे होते हैं। किसी को तुम्हारे लिजलिजेपन का पता नहीं चलेगा। लेकिन पुलिस के अस्पताल पहुंचाने से बच गये किसान के चचेरे भाई ने तुम्हारी शर्मसार करने वाली करतूत को दुनिया के सामने ला दिया।
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वो किसान तो 35 हजार रुपये लेकर भैंस खरीदने निकला था। तुम उन 35 हजार से क्या खरीदोगे? महंगे कपड़े, पत्नी के लिए गहने, परिवार के लिए जमीन? जायदाद, लेकिन क्या उन 35 हजार से किसी की जिंदगी खरीद सकते हो? नहीं खरीद सकते। लेकिन उन 35 हजार का लालच मन में नहीं आया होता तो तुम एक जिंदगी बचा जरूर सकते थे। कहते हैं जिंदगी अनमोल है। भला एक जिंदगी के सामने 35 हजार की क्या बिसात? लेकिन तुम जिंदगी की अहमियत क्या जानो? वक्त न करे कि भविष्य में ऐसा कुछ तुम्हारे किसी अपने के साथ हो। लेकिन जिंदगी की अहमियत का अहसास तुम्हें तभी होगा जब तुम किसी अपने को दर्द से तड़पता देखोगे। उसक टीस को महसूस करोगे।
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हो सकता है पुलिस तुम तक और तुम्हारे साथियों तक कभी न पहुंच सके। लेकिन उस किसान की चीखें, उसके परिवार की आहें तुम्हारें कानों तक हमेशा पहुंचती रहेगी। आज नहीं तो कल उस किसान का परिवार इस हादसे से उबर जाएगा। उसकी पत्नी इस हादसे को अपनी नियति मान लेगी। बच्चे धीरे-धीरे पिता की मौत को भूलकर सामान्य जिंदगी जीने लगेंगे। लेकिन यकीन मानो तुम अपनी इस करनी को कभी नहीं भूल सकोगे। उठते-बैठते-जागते-सोते दर्द से कहारते उस किसान का चेहरा तुमसे बार-बार सवाल करता रहेगा। बताओ मेरा कसूर क्या था?
