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वे एक दलित नेत्री के ऐन चुनाव से पहले ढेर हो जाने को लेकर भाजपाइयों की तरह खुश थे !

- धीरेश सैनी
500 और 1000 का नोट झटके में बंद कर देने की पीएम की घोषणा के बाद एक मज़दूर संगठन के पदाधिकारी का एकलाइना फेसबुक स्टेटस था- "सूपणखा हारी रावण जीता!" तो क्या वे एक दलित नेत्री के ऐन चुनाव से पहले ढेर हो जाने को लेकर भाजपाइयों की तरह खुश थे? ठीक है, वह दलित नेत्री अपनी पार्टी का टिकट बांटते हुए भी ख़ूब पैसा बटोरती हैं। लेकिन, जो विदेश से काला धन लाने की बात करते थे, उनका यह कदम वे इस ख़ुशी के रूप में देखते हैं? जितना पैसा लोकसभा चुनाव में बीजेपी के लिए खर्च हुआ, वह किस पवित्र गंगा से आया था? और अब जो हो रहा है, वह किन सरमायादारों के पेट भर रहा है?

बहरहाल, उन्हें हक़ है, यह कहने का कि दलित नेत्री ने कोई वैकल्पिक रास्ते खड़े करने का प्रयास नहीं किया और वे बीजेपी के साथ भी रह ही चुकी हैं। लेकिन, उनके लिए दलित नेत्री शूर्पणखा हैं। रामायण की पात्र शूर्पनखा को लेकर भी बहस की जा सकती है पर एक बेहद प्रचलित इमेज को लेकर उनसे बारीकी से सोचने की उम्मीद छोड़ता हूँ। उसी बनी-बनाई इमेज से दलित नेत्री को जोड़ने की उनकी प्रतिभा की वजह तो जान सकता हूँ? असल में लम्बे संघर्षों में रहते हुए भी उनके दिमाग़ में कूड़ा बजबजाता ही रहा जिसे कोई विचार या संघर्ष साफ नहीं कर पाएगा।

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मुझे कोफ़्त बहुत हुई। लम्बा लिखना, समझाना भी ठीक नहीं लगा। चुभती बात कहने के लिए मैंने कुछ ऐसा लिखा कि सीता राम के प्रकाश का बताइए या कुछ ऐसा। उनका कोई जवाब नहीं आया, न उनकी मित्रमंडली के मेरे कॉमन दोस्तों ने अपने साथी की बात पर कोई एतराज जताया।

एक कायस्थ महिला जो सुंदर और विवेकपूर्ण लिखती हैं ने बीएसपी की नेता सुश्री मायावती की उनके एक वाक्य को लेकर खिल्ली उड़ाई कि किसानों को "अपनी आत्महत्या" के लिए कैसे मज़बूर किया जा सकता है। उन्होंने आत्महत्या के साथ अपनी शब्द जोड़ने की खिल्ली उड़ाई थी और लिखा था कि मायावती ने यह एक वाक्य बिना पढ़े बोला। साथ में खिल्ली उड़ाने के लिए कुछ निशान बनाए थे। मायावती का कहा कम्युनिकेटिव है लेकिन उन्हें एडवोकेट मायावती के "अनपढ़" होने का मज़ाक बनाना था। वे रवीश की प्रशंसक हैं पर अग़र यही पैमाना है तो रवीश की हिंदी के संवाद जेंडर की दृष्टि से भयंकर ग़लतियों से भरे रहते हैं। हमारे इधर के कवियों की भाषा के वाक्यों में भी आप यह देख सकते हैं।

जाहिर है, यह इलाके के डायलेक्ट की वजह से है, उनकी कोर्स की किताबों की वजह से नहीं। दूसरे नेताओं के यहां भी यह सब पकड़ा जा सकता है पर जाति की वजह से कायस्थ महिला लेखिका यह सब नहीं देखेंगी। यूं तो ब्राह्मण लम्बे समय तक कायस्थों के पढ़-लिखकर चुनौती बन जाने को भी बर्दाश्त नहीं कर पाते थे और कायस्थों को दलित ही मानते थे। महिलाओं के लिखने-पढ़ने और नेतृत्व की भूमिका में आने को तो दलित भी आसानी से नहीं पचा पाते। अपर कास्ट की महिलाएं भी दलित महिलाओं को अग्रणी भूमिका में नहीं पचा पातीं।
रही बात आम सवर्णों की तो मायावती को लेकर वे जहर उगलते ही रहते हैं। सर्वविदित भ्रष्ट नौकरीपेशा, कारोबारी, दलाल आदि जिनमें पिछड़ी जाति के लोग भी शामिल हैं, दो दिनों से मायावती को लेकर जिस तरह की पोस्ट लिख रहे हैं, उससे लगता है कि वे अपनी काली कमाई को लेकर बीजेपी की तरह सन्तुष्ट हैं। अपनी जन्म के समय की पृष्ठभूमि के आम लोगों पर पड़ रही मार से इन गद्दारों का कोई लेना-देना नहीं है।

क्या अच्छा होता कि ये सब दिमाग़ी कूड़े को साफ कर मायावती को क्रिटिकल ढंग से कड़ाई से ही देखते और देश के लोकतन्त्र तथा आम लोगों की स्वतंत्रता, आत्मनिर्भरता व गरिमा की बची-खुची सम्भावनाओं को निगल रहे डायनासोर को भी देख पाते। बाकी ध्यान रहे कि पैसे लेकर टिकट बांटने की शुरुआत भी बीएसपी ने नहीं की। "किसान मसीहा" भी यह करते रहे थे। [अगर आप भी लिखना चाहते हैं कोई ऐसी चिट्ठी, जिसे दूसरों तक पहुंचना चाहिए, तो हमें लिख भेजें- merekhatt@gmail.com. हमसे फेसबुकट्विटर और गूगलप्लस पर भी जुड़ें]
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