उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ में कुंडा तहसील से 15 किमी दूर दक्षिण-पश्चिम दिशा में मौजूद बलीपुर गांव में घुसते ही लोहे के सफेद बोर्ड पर लाल-हरे रंग से ‘‘राजा भइया जिंदाबाद’’ लिखा है, जो यह बताने के लिए काफी है कि इस इलाके में किसका सिक्का चलता है। बोर्ड पर निवेदक के रूप में बलीपुर गांव के प्रधान रहे नन्हे सिंह यादव का नाम है।

इसी बोर्ड के ठीक पीछे वह दो बीघा जमीन और उसके एक किनारे पर अधूरी बनी दुकानें हैं, जिस पर कब्जे के लिए हुए खूनी संघर्ष ने 2 मार्च 2013 को महज सवा घंटे के भीतर नन्हे सिंह यादव और उनके भाई सुरेश यादव की जान ले ली ।
घटना की सूचना मिलते ही क्षेत्र के बेहद ईमानदार और मृदुभाषी क्षेत्राधिकारी जियाऊल हक अपने गनर लेकर उस जगह रात 8 बजे पहुँच गये। घटनास्थल पर खतरा देख जियाऊलहक के दोनों गनर उनको छोड़कर भाग खड़े हूए। रात 11 बजे भारी पुलिस बल बलीपुर गांव पहुंचा और सीओ की तलाश शुरू हुई। आधे घंटा बाद उसी क्षेत्र के क्षेत्राधिकारी जियाउल हक का शव प्रधान के घर के पीछे खड़ंजे पर पड़ा मिला।
ध्यान दीजिएगा कि वलीपुर का ग्राम प्रधान नन्हें सिंह "कुंडा के गुंडा" नाम से मशहूर "राजा भैया" का बेहद करीबी था और राजा भैया के समर्थन से ही प्रधानी का चुनाव जीता था। और जिस गुड्डू सिंह से नन्हे सिंह का विवाद था वह राजा भैया का ड्राइवर है।
घटना में महत्वपूर्ण बात यह थी कि कुंडा के कोतवाल "सर्वेश मिश्र" भी आक्रोशित ग्रामीणों से घबराकर नन्हे सिंह के घर की तरफ जाने की हिम्मत न जुटा सके और जियाऊल हक के गनर तो पहले ही उनको छोड़कर भाग खड़े हो चुके थे। किसके इशारे पर ? सुनिए फिर ।
"भदरी नरेश" को यदि कोई जानता हो तो वह समझ सकता है क्षेत्र में उनकी दहशत और प्रभाव को और जो नहीं जानता वह जान ले कि इलाहाबाद-लखनऊ हाईवे पर स्थित कुंडा से 4•5 किमी दूर स्थित है भदरी स्टेट और उस स्टेट की हवेली से 2 किमी पहले अपने पैर से जूते चप्पल उतार कर नंगे पैर चलना पड़ता है और साईकिल या मोटरसाइकल की सवारी भी आप नहीं कर सकते , डगरा कर ले जाईये वो भी नंगे पैर , नहीं तो राजा ठाकुर उदय सिंह के सामने पेशी हो जाएगी।
यह हमारे लोकतांत्रिक देश भारत में होता है।
मामला बिलकुल स्पष्ट है पर ठाकुर वोटों के लालच में अखिलेश यादव द्वारा सब लीपापोती कर दी गयी और राजा भैया आज भी उत्तरप्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं ।
ट्रेन या बस से उतरकर अपने क्वार्टर जिस भी रिक्शे से जाते थे डिप्टी एसपी जियाऊल हक उस रिक्शे वाले को भैया कहते थे , और उसे पूरा पैसा सप्रेम देते थे , और इतने ईमानदार कि "राजा भैया" से संबंधित सभी केस अपने हाथ में लेकर जाँच कर रहे थे , और जाँच अंतिम नतीजे पर थी। मौका मिलते ही मार दिये गये , अब आप सबकुछ समझ सकते हैं।
एनआईए के अधिकारी तंजील अहमद भी तमाम जाँचों के अंतिम दौर में थे वह भी मार दिये गये।दादरी कोतवाली से महज 100 मीटर की दूरी पर संकरी अयूब गली सोमवार सुबह 5 बजे गोलियों की आवाज से थर्रा गई। पुलिस के मुताबिक 14 पुलिसकर्मियों की एक टीम अपराधियों को पकड़ने पहुँची लेकिन घर में छिपे अपराधियों ने बेहद करीब से सब-इंस्पेक्टर मोहम्मद अख्तर को गोली मार दी।गोली अख्तर की गर्दन को चीरती हुई सामने वाले घर के गेट में जा लगी। अब तथ्य यह आ रहें हैं कि गोली पुलिस की रिवाल्वर से ही मारी गयी , 14 पुलिसकर्मियों को एक खंरोच भी नहीं आई क्युँकि वह घटना स्थल से भाग घड़े हुए।
तंजील अहमद की हत्या की तरह इस हत्या में भी कोई आरोपी बनाया जाएगा और बयान दिला दिया जाएगा , हम और आप कुछ दिन बाद सब भूल जाएंगे और फिर 5-6 या 10 साल बाद वह आरोपी अदालत से सबूतों के अभाव में बाईज्जत बरी हो जाएगा। फिर आपको यह हमें याद भी नहीं रहेगा कि कौन थे जियाऊल हक , तंज़ील अहमद या मुहम्मद अख्तर। मामला खत्म , अधिकारियों की हत्या का मकसद सफलतापूर्वक पूरा।
फिल्म "गंगाजल" में "बच्चा यादव" की हत्या के बाद पुलिस का "साधूयादव और सुन्दर यादव" को कुत्ते की तरह दौड़ा दौड़ा कर मार डालना हो या "सिंघम" में बाजीराव सिंघम अपने ही विभाग के एक इंस्पेक्टर की भ्रष्ट राजनीतिज्ञ जयकांत शिक्रे द्वारा मार डालने का बदला लेना केवल फिल्मों तक ही अच्छा लगेगा , वास्तविक पुलिस अपने ही अधिकारियों की रक्षा नहीं कर सकती तो जनता की क्या करेगी । मुठभेड़ में पुलिसकर्मियों की भी जान जाती ही है परन्तु अपने ही अधिकारियों को भीड़ में अकेला छोड़कर पुलिस फोर्स का भाग जाना नामर्दी नहीं तो क्या है?
बहुत लोचा है पर्दे के पीछे , पुलिस की कार्रवाई और आरोपी को पकड़ना और अदालत द्वारा छोड़ देना अगर हमें और आपको नहीं दिखता कि पुलिस किनके हाथों खेल रही है तो आप और हम अंधे हैं और कुछ नहीं। पुलिस कमजोर लोगों के लिए शेर और मजबूत लोगों के लिए गीदड़। (फेसबुक वॉल से)