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इसे पढ़कर आपकी आंखों में आंसू आ जाएंगे, काश हर इंसान की सोच ऐसी हो जाए !

- मुश्ताक़ अली

प्रिय दोस्तों,
आप सबसे एक घटना शेयर करना चाहता हूँ जो मेरे स्कूल की है। बात छोटी सी है लेकिन सब्र और संतोष का बहुत बड़ा सबक समेटे हुए है। मेरे विद्यालय में मिड-डे-मील पकाने के लिए दो कुक काम करती हैं, जो गाँव की रहने वाली हैं। इनमे से एक थोड़ा उम्र दराज़ है, जिनका नाम शीना देवी है और जिसे मैं और सभी बच्चे शीना आंटी कहकर बुलाते हैं। शीना आंटी पंद्रह साल पहले विधवा हो गई थीं। उनकी तीन बेटियां और एक बेटा है। दो बेटियों की शादी कर चुकी हैं और एक बेटा और बेटी अभी कुंवारे हैं। आमदनी का और कोई ख़ास जरिया नहीं, सिवाय स्कूल से मिलने वाले मेहनताने के। वर्तमान में हरियाणा में मिड-डे-मील कुक को मेहनताने के रूप में 2500 रुपये प्रतिमाह मिलते हैं। ये राशि भी लगभग दिसंबर 2014 से मिलने लगी है। इससे पहले 1100 रुपये प्रतिमाह मिलते थे।


दूसरी कुक प्रमिला देवी नाम की महिला है जो गाँव के सेल्फ हेल्प ग्रुप की सदस्य होने के नाते बतौर कुक विद्यालय में कार्यरत हैं। प्रमिला देवी के पास 4 लड़कियां है और उसका घरवाला मानसिक रूप से कमजोर है, कुछ काम-धाम कर पाने में असमर्थ है। मतलब प्रमिला देवी का भी घर खर्च स्कूल से मिलने वाले 2500 रुपये पर ही निर्भर है।

विद्यालयों में कुकों की संख्या स्कूल की छात्र संख्या पर निर्भर है। 1 से 25 बच्चों तक 1 कुक की व्यवस्था है, 26 से 99 तक दो कुक की व्यवस्था है। छात्र संख्या बढ़ने पर कुकों की संख्या भी बढ़ती जाती है। छात्र संख्या कम होने पर जूनियर कुक को हटना पड़ता है।

गत वर्ष मेरे विद्यालय में- जो कि एक छोटे से पहाड़ी गाँव में स्थित है- छात्र संख्या घट कर 23 रह गई। नियमानुसार जूनियर कुक प्रमिला देवी का हटना तय था। मैंने उसको बता भी दिया था कि अगले महीने से तुम विद्यालय मत आना। इस बात का पता चलने पर शीना आंटी मेरे पास आकर पूछने लगीं कि प्रमिला को हटाया जा रहा है क्या? मैंने कहा, हाँ, ऐसा ही नियम है। बच्चे बहुत कम रह गए हैं इसलिए आगे से आप अकेले ही काम करेंगी। इस पर उस विधवा औरत, शीना आंटी ने जो बात कही उसने मुझे झकझोर कर रख दिया।

शीना आंटी ने कहा, सर प्रमिला बेचारी तो पहले ही अपने घरवाले की वजह से बहुत दुखी है। न ही उसके पास कमाई का कोई साधन है। उसका तो चूल्हा बंद हो जायेगा। क्या ऐसा हो सकता है कि हम दोनों साथ काम करती रहें। मैं अपनी तनख्वाह में से आधी तनख्वाह उसे दे दिया करूंगी। पहले भी तो हम 1100 रुपये प्रतिमाह पर काम कर रहे थे, अब 1250 रुपये में काम चला लेंगे। कितनी बड़ी बात कह गई शीना आंटी। इतना सब्र और संतोष। तब से वो दोनों इकट्ठी काम कर रही हैं।

सवाल ये है कि हम मोटी तनख्वाह और बड़े बड़े पैकेज लेने वाले क्या कभी सोच भी सकते हैं अपनी तनख्वाह में से हिस्सा बंटाना? जबकि हम खुद बहुत ज्यादा जरुरत मंद हों। सोचिये जरा, सोचेंगे तो कुछ न कुछ अच्छा करने की प्रेरणा अवश्य मिलेगी। मुझे तो मिल गई। 
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