Top Letters
recent

टन टनाटन टन टन टारा...राष्ट्रवादियों के ये शब्द सामान्य नहीं होते, दिव्य चेतना से उतरते हैं

- संजय शर्मन जोठे

भक्त: (छठवां प्रश्न) भगवान प्रचण्ड राष्ट्रवादी और भक्त महर्षि अभिजीत का एक पद है "टन टनाटन टनटन टारा चलती है क्या नौ से बारा" कृपया हम अज्ञानियों के लिए इस पद का मर्म समझाने की अनुकम्पा करें।

भगवान: मूर्खानन्द स्वार्थी, ये बड़ा ही प्यारा पद है राष्ट्रवादी अभिजीत का, पद का सौंदर्य तो अनुपम है ही अभिजीत के नाम में भी एक माधुर्य छुपा हुआ है अभिजीत का नाम सुनते ही सहसा शिलाजीत की स्मृति हो आती है। भारत में सारे ब्रह्मचारी बाबा और योगी और कुछ बेचें या न बेचें शिलाजीत जरूर बेचते हैं। इस तरह अभिजीत का नाम भारत की विराट और समावेशी आध्यात्मिकता का दर्पण नजर आता है। संसार और परमात्मा का अद्भुत सन्तुलन बनाते हुए सभी ब्रह्मचारी बाबाजन शिलाजीत और वैराग्य दोनों एक ही पैकेट में बेचते हैं। ऐसे अपूर्व महिमाशाली अभिजीत के पद का स्मरण करते हुए आज मेरी आँखें गीली हो उठी हैं, तुम भी यहां कोने में बैठकर रो लो थोड़ी देर...  फिर पद की व्याख्या शुरू करूँ।

हाँ, तो महर्षि कहते हैं टन टनाटन टन टन टारा.... अब ध्यान से सुनो, ऐसे समाधिस्थ राष्ट्रवादियों के शब्द सामान्य शब्द नहीं होते, ये दिव्य चेतना से उतरते हैं। इन्हें सात अलग अलग स्तरों पर समझा जा सकता है। इस  "टन" शब्द पर संयम करो, टन या तन से ही तंत्र बना है "तननात त्रायते इति तन्त्रम" इसी तंत्र के मंत्र ने कई यंत्र रचे हैं इस मुल्क में अभी चंद्रास्वामी को देखा ही होगा तुमने। इस टन का दीर्घ उच्चार किसी घण्टे की आवाज जैसा है जैसे कि कहीं टनटन हो रही हो। इसी की एक अभिव्यक्ति टुनटुन के रूप ने भी हुई थी, हुस्न के पहाड़ की मलिका टुनटुन का मूल नाम उमा देवी था,

इसे भी पढ़ें...
देशभक्ति को इतना सस्ता ना बनाएं कि हर कोई, गली-नुक्कड़ पर इसकी दुकान सजाने लग जाए

उमा असल में ‘उई माँ’ से बना है जिसपे एक अन्य बोलीवूड सन्त का पद है " उई माँ उई माँ ये क्या हो गया" इस उमा को उलट दें तो माउ बनता है, छोटे बच्चों को बिल्ली शब्द नहीं आता तो उनके लिए माताएं माउ शब्द का प्रयोग करती हैं माउ असल में माउस की दुश्मन होती है। हिंदी में इसे बिल्ली कहते हैं जो बिल में रहने वाले माउस को खाती है। ये बिल शब्द भी गजब का है जो लोग इनकम टैक्स या बिजली बिल नहीं भरते वे बड़े लंबे बिलों में छुप जाते हैं। ऐसे बिल बन्द करने के लिए अभी जीएसटी बिल लाया गया है जिस पर पूरी संसद बिलबिला रही है।

इस टन में एक और टन जोड़ दें तो टनाटन बनता है जो सनातन की याद दिलाता है। ये टनाटन ही सनातन है। असल में अगर आंखें खोलकर देख सको तो इस चराचर अस्तित्व में सभी कुछ दिव्य और सनातन है। 

अब महर्षि आगे कहते हैं 'टन टन टारा' ये टारा भी टार से बना है, टार की बनी सड़कें तुमने देखि होंगीं, काली लंबी सड़कें जो कहीं नहीं पहुंचती। इसी को महर्षि भूपेंद्र ने घरौंदा उपनिषद में गाया है कि इन उम्र से लंबी सड़कों को मंजिल पे पहुंचते देखा नहीं। सड़क को डगर भी कहा है कुछ रहस्यवादियों ने और 'चिकनी डगर है पतली कमर है' के ढंग से भी गुनगुनाया है। ये सब एक ही सत्य की अभव्यक्तियाँ हैं। टार में ये सड़क या डगर के साथ ही टारा में एक और अर्थ छुपा है इसे तारना या तारण भी कहा गया है। अर्थात इस काली चिकनी अंधी डगर से तारना या बचाना। इस पद में असल मे उस भक्तवत्सल भगवान की महिमा गाई है जो तुम्हें संसार से तारता है।

आगे आता है 'चलती है क्या नौ से बारा' इसे भी समझो ... यह वाक्य एक स्त्री को कहा गया है, उससे पूछा जा रहा है कि क्या वो चलेगी? इसमें उससे अनुमति या सहमति लेने का सभ्य भाव है साथ ही इसमें एक बात और छुपी है। स्त्री चित्त प्रतीक्षा करता है वो खुद कभी निमंत्रण नहीं देता, निमंत्रण की प्रतीक्षा करता है जैसे भक्त भगवान की प्रतीक्षा करता है, नेता चुनाव की प्रतीक्षा करता है और सरकारी कर्मचारी पांच बजने की प्रतीक्षा करता है। इस प्रतीक्षा में ही अध्यात्म का सार छुपा है। तुम्हारे करने से कुछ न होगा, उसकी अनुकंपा जब बरसेगी तो तुम्हारे सारे पाप ताप की निर्जरा हो जाएगी। बस साक्षी भाव से बैठो और प्रतीक्षा करो। 
अब नौ से बारा इस पद का शिखर है, नौ माह गर्भ में रहकर तीन कदम संसार से परमात्मा की तरफ तुम बारह की तरफ बढ़ते हो, यह दिन के बारह हों तो ज्ञान का सूर्य अपनी सर्वोच्च ऊंचाई पर चमकता है और रात में अगर बारह बजें तो एक नया दिन शुरू होता है इस तरह दोनों अर्थों में ये ज्ञान और नए जन्म का प्रतीक है. रात के समय में प्रतीक्षा और नव जन्म का यह मेल ही मोक्ष बन जाता है, इसीलिये इस पद की इतनी महिमा गाई गयी है.

भक्त: ही ही ही ही ... अहो प्रभु अद्भुत व्याख्या, आप धन्य हैं भगवान् श्री 

भगवान: अब तुम समझ गए, तुम मोक्ष को उपलब्ध हुए। अब जाओ और घर घर में मेरे प्रवचन पहुंचा दो, तुम जैसे जागरूक सन्यासियों के कारण भारत में महान आध्यात्मिक क्रांति होने वाली है। तुम धन्यभाग हो।

(इस प्रवचन के बाद स्वयं भगवत्ता ने रजिस्टर्ड भगवान पर फूलों की वर्षा की और सम्मुख बैठे सभी फूल समाधि को उपलब्ध हुए)
[अगर आप भी लिखना चाहते हैं कोई ऐसी चिट्ठी, जिसे दूसरों तक पहुंचना चाहिए, तो हमें लिख भेजें- merekhatt@gmail.com. हमसे फेसबुक, ट्विटर और गूगलप्लस पर भी जुड़ें]
Myletter

Myletter

Powered by Blogger.