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मुस्लिमों के नाम पैगाम, मुलायम एंड कंपनी के दिखाए बीजेपी फोबिया से मुक्त हों


-मो. जाहिद 

इंसान दो पीस टमाटर भी लेने जाता है तो तीन बार अलट-पलट कर देखता है और फिर लेता है लेकिन हम अपना वोट आँख बंद करके दे देते हैं। किसी व्यक्ति की विश्वसनीयता उसके पूर्व के आचरण और इतिहास को देखकर पता लगाया जा सकता है, मिनटों का काम है- पता करना कि अमुक व्यक्ति कितना भरोसेमंद है? अपने वचन का कितना पक्का हो सकता है।


अगर आज उत्तर प्रदेश के एक नेता की बात करें तो श्रीमती मूर्ती सिंह और श्री सुधर सिंह के तीसरे पुत्र मुलायम सिंह यादव, धुर अवसरवादी नेता रहे हैं, जिनको टमाटर से भी ज्यादा आसानी से पहचाना जा सकता है। अपनी राजनीति में अपने गुरु नत्थू सिंह से लेकर आज आज़म खान तक उनके इस अवसरवादी चरित्र से मिले ज़ख्म को सहला रहे हैं।


डॉ. राम मनोहर लोहिया ने 1954 में फर्रुखाबाद में बढ़े हुए नहर रेट के विरुद्ध आंदोलन किया था। उन्होंने जनता से बढ़े हुए टैक्स न चुकाने की अपील की थी। इस आंदोलन में हजारों सत्याग्रही गिरफ्तार हुए। इनमें 15 वर्षीय मुलायम सिंह यादव भी शामिल थे। यहीं से जेपी और लोहिया के शिष्य बने मुलायम सिंह यादव समय के साथ समाजवाद को माधुरी दीक्षित के ठुमको से चोट मार कर सैफई मे दफ़न कर चुके हैं। जिस लोहिया और जयप्रकाश के वारिस भारतीय राजनीति में सुक्ष्मदर्शी लेकर ढूँढने से भी नहीं मिलेंगे वहीं उनके शिष्य मुलायम सिंह यादव ने खानदान के 36 लोगों को महत्वपूर्ण पदों पर "सेट" करके राजनीति में "परिवारवाद" से आगे बढ़कर "खानदानवाद" को आगे बढ़ा दिया।


मुलायम सिंह यादव 1989 में पहली बार मुख्यमंत्री भारतीय जनता पार्टी के समर्थन से ही बने और तब से भाजपा के साथ उनकी गलबहिंया आज तक सफलतापूर्वक चली आ रही हैं। 1990 में ही कार सेवकों पर गोली चलवा कर और 19 कारसेवकों की लाश पर कुर्सी रखकर पुनः मुख्यमंत्री बने मुलायम सिंह यादव दरअसल बाबरी मस्जिद के मुख्य गुनहगार हैं। उत्तेजक बयान देकर कारसेवकों को उत्तेजित करना और सनसनी पैदा करके उनको अनियंत्रित होने देना और फिर उन पर गोली चलाकर पूरे प्रदेश को भयंकर दंगे की आग में झोंक देने का इतिहास मुलायम सिंह यादव का ही है।



दंगों से केवल दो पार्टी को ही आज तक लाभ मिला है "भाजपा-सपा" भाजपा अपने वोटों का ध्रुवीकरण कराकर, तो सपा मुसलमानों को दंगे से डराकर एकमुश्त वोट लेती रही है। इसी गलबहियां का परिणाम था कि आजादी के बाद पहली बार प्रदेश के 42 जिले दंगों की आग में जले। कारसेवकों पर गोली चलाकर मुसलमानों के मसीहा बने मुलायमसिंह यादव 26 साल बाद अब उस गोलीकांड पर खेद व्यक्त कर रहे हैं तो इसका कारण फिर अवसरवाद ही है, जिससे भविष्य में भाजपा के पुनः समर्थन की संभावना को जीवित रहे।

लोहिया, जेपी, वीपी सिंह, नीतीश, समधी लालू से लेकर पत्नी मालती देवी तक से धोखे का इतिहास रखने वाले मुलायम सिंह यादव का मुसलमानों को 25 साल से दिये जा रहे धोखे का भी पर्दाफाश हो ही गया है। अब स्पष्ट हो गया है कि मुस्लिम आरक्षण की कीमत वह हिन्दू मतों से वसूलना चाह रहे हैं। यही है इनकी राजनीति और यही है इनका स्वभाव।


अपने समाज से गद्दारी करके एमपी-एमएलए बनने के लिए अवसरवादी नेतृत्व के सामने कुत्ते की तरह दुम हिलाने वाले मुसलमान नेताओं को समझ लेना चाहिए कि इनकी सारी राजनीति का उद्देश्य अपने खानदान और अपने यादवी समाज तक ही सीमित है। उत्तर प्रदेश विधानसभा में 69 मुस्लिम विधायक होकर भी 4.5 वर्ष में अगर मुसलमानों के सामूहिक हित का एक भी निर्णय ना होकर "मुजफ्फरनगर" "अखलाक" हो जाता है तो समझ लेना चाहिए कि यह 69 चारण राजनीति के चाटुकार से अधिक कुछ नहीं।


अखिलेश सरकार और भाजपा सरकार में कोई अंतर नहीं। इसलिए अब समाजवादी पार्टी के दिखाए भाजपा फोबिया से मुक्त होकर मुस्लिम समाज को ऐसी पार्टी को त्याग कर सबक सिखा देना होगा जिससे भविष्य में कोई पार्टी उनके साथ "वोटहरामी" ना कर सके और यह नारा बुलंद कर दीजिए कि 'तुम मुझे आरक्षण दो मैं तुम्हें वोट दूँगा'।

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