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राजदीप को चिट्ठी, हम आपसे भरोसेमंद खबरें चाहते हैं, चाहे वो किसी पार्टी के पक्ष में जाएं या विपक्ष में


-नवीन चौधरी
राजदीप सर,
आपने ट्विटर छोड़ दिया. कल से यही चर्चा है कि – Rajdeep Sardesai quits Twitter. आज के टाइम में सोशल मीडिया से दूर होना कितना मुश्किल है जानता हूँ, खास तौर पर जब आपके प्रोफेशन में उसका बड़ा रोल हो. फिर भी कहूँगा सही किया. कभी कभी आदमी को खुद को भी टाइम देना चाहिए वर्ना एक तरफ नौकरी और दूसरी तरफ सोशल मीडिया ले लेता है बाई गॉड.

सबसे पहले आपको उस चमत्कार के लिए बधाई जिसमें हैक हुए अकाउंट से भी आपने ट्वीट डाली. मैं गाँधीवादी तो हूँ नहीं, इसलिए कहता हूँ कि हैकिंग वाले बहाने की जरूरत नहीं थी क्योंकि मेरा मानना है कि कोई आपको गाली दे तो आप भी पलट के दो. असहमत होना अलग बात है पर अपने को गाली देने का हक़ किसी को नहीं और अगर उसे है तो अपने को भी है. मैं गाँधीवादी नहीं हूँ इसका मतलब ये न निकाल लीजियेगा कि मैं गोडसे समर्थक हूँ. हर गाँधी विरोधी गोडसे समर्थक नहीं होता, ठीक वैसे ही जैसे हर मोदी विरोधी 'खान्ग्रेसी' नहीं होता और मोदी समर्थक भक्त नहीं होता.

ये तो भूमिका हो गयी, अब आते हैं असली पॉइंट पे. यहाँ से मैं जो कहूँगा वो सिर्फ आपके लिए नहीं हैं, वो है उन सब पत्रकारों के लिए जो ट्रोल किये जाते हैं और अक्सर उन्हें biased होने का उलाहना झेलना पड़ता हैं.क्या एक बार आप सब मीडिया वाले ये नहीं सोचते कि अचानक ऐसा क्या हुआ है पिछले 7-8 सालों में कि लोग सोशल मीडिया पर इतना aggresive होकर ट्रोल करने लगे? और ये लोग कम नहीं हो रहे बल्कि बढ़ते जा रहे हैं.

हम आम हिन्दुस्तानियों का एक सामान्य सा मत था कि राजनीतिज्ञ हमें बांटते हैं और हमारे बीच नफरत फैलाते है. पिछले कुछ सालों में हमारी धारणा में एक नई चीज जुड़ गयी है कि मीडिया हमें बांटता है और हमारे बीच नफरत फैलाता है. ये धारणा मजबूत होती जा रही है और पहले ट्रोल करने वाले लोग सिर्फ वो होते थे जो हिन्दू राष्ट्र टाइप की बातें करते थे, अब आप लोगों को कॉमन मैन भी ट्रोल करने लगा है. आप ने कभी सोचा है क्यों?

हम सब इंसान है और हम सब की एक विचारधारा हो सकती है और उसे अभिव्यक्त करने का हम सबको अधिकार है पर कुछ लोग या प्रोफेशन ऐसे होते हैं जिनसे हम उम्मीद करते हैं कि ये लोग अपनी विचारधारा को अपने प्रोफेशन पर न आने देंगे और वही करेंगे जो उनके प्रोफेशन की मर्यादा के अनुरूप हो. उदाहरण के लिए- राष्ट्रपति या स्पीकर हमेशा सत्ताधारी दल वाले बनाते हैं और ऐसे को जो उनकी विचारधारा के होते हैं पर क्या ये लोग इन पदों पर आने के बाद विचारधारा के आधार पर काम करते हैं? नहीं न. वो लोग वैसे निर्णय लेते हैं जो सबके लिए हों और सही हों. पत्रकारों को भी हम इसी श्रेणी में रखते हैं. आप जब वोट डालने जाएँ तब चाहे कम्युनिस्ट होइए या दक्षिणपंथी होइए पर जब हमें खबर दिखाइए तो सिर्फ वो दिखाइए जो सही है, और वो सारी ख़बरें दिखाइए जो सही है. फिर भले ही वो खबर आपकी विचारधारा के खिलाफ जाये या मेरी. जब ऐसा होगा तो कम से कम एक आम आदमी आपको ट्रोल नहीं करेगा, गाली नहीं बकेगा. बाकि झंडे वाले ट्रोल का तो इलाज संभव नहीं.

आप मानेंगे कि बहुत से पत्रकारों की विचारधारा वर्तमान सरकार या पार्टी से नहीं मिलती और दुर्भाग्यवश अब ये चीज कैमरे पर साफ नज़र आने लगी हैं.ऐसा नहीं कि ये सिर्फ एक साइड से हो रहा है, एक पक्ष पत्रकारों का ऐसा भी है जो सिर्फ सत्ताधारी दल की तरफ से बोलता है. आप इसे झुठला नहीं सकते कि दोनों ही टाइप के पत्रकार ट्रोल किये जाते हैं अपोजिट खेमे की तरफ से. सर, हम आप सबसे जेन्युइन खबर चाहते है, चाहे वो किसी भी पार्टी के पक्ष या विपक्ष में जाये. टीवी देखते हुए कई बार हमें लगता है कि हम पत्रकारों को नहीं बल्कि पक्ष और विपक्ष के अन-ऑफिसियल प्रवक्ताओं को सुन रहे हैं. सरकार विरोधी पत्रकार भाजपा प्रवक्ता को ऐसे मौके पर चुप करा देता है जब वो कोई ढंग की बात बोल रहा होता है. सरकार समर्थक पत्रकार इसका ठीक उलट करके विपक्षी नेता को ऐसे मौके पर चुप करा देता है.

राजदीप सर, आम आदमी होने के कुछ फायदे है. मेरे पास biased होने का आप्शन है, सेलेक्टिव आउटरेज का भी आप्शन है, पर आप लोग जिस प्रोफेशन में हैं उसमें ये अधिकार आपके पास नहीं है. मैं आप पर ये आरोप नहीं लगा रहा कि आप biased हैं पर कुछ घटनाएँ, कुछ ख़बरें आपके प्रोफेशन के लोग ऐसे दिखाते हैं कि वो समाज पर गलत असर छोडती हैं.

सर, जब अखलाक को राजनीती के लिए मारा जाता है तो मेरा मन दहल उठता है और मीडिया का भी. उसके एक महीने के अन्दर जब केरल में सुजीत को भी राजनीती के लिए मारा जाता हैं मेरा मन उस समय भी दहल उठता है पर दुर्भाग्यवश मीडिया के प्रभावी और बड़े हिस्से का नहीं. वो खबर दिखाते ही नहीं जब तक कि सोशल मीडिया में सुर्खी न बन जाये. फिर मजबूरी वश दिखाना पड़े तो ऐसे दिखाते हैं जैसे कोई मामूली सड़क दुर्घटना हो.

जब ललित मोदी को सुषमा मदद करती है तो मुझे खुन्नस चढ़ती है और मीडिया को भी. मीडिया के प्रभावी लोग इस पर अपने व्यूज सोशल मीडिया के जरिये बताते हैं पर जब अगस्ता में सोनिया गाँधी का नाम आता है तो मीडिया के प्रभावी लोग सोशल मीडिया पर व्यूज शेयर करना अवॉयड करते हैं. ज्यादा से ज्यादा इतना बताते हैं कि रात 9 बजे बहस देखिये हमारे चैनल पर. आपने भी अगस्ता मामले में 2 -3 दिन पहले यही किया था न?

झंडे वाले ट्रोल कहते हैं कि आपको दूसरी पार्टी ने पैसा दिया, कोई कुछ और कह देता है. उनके साथ बहुत से और लोग कहने लगे हैं कि मीडिया चोर है दलाल है. पहले मैं ऐसे लोगों से इत्तफाक नहीं रखता था पर अब जब हमें वो पत्रकार दिखते हैं जो कैमरे के पीछे ख़बरों को ‘क्रांतिकारी’ बनाते हैं और वो भी जो विडियो ‘doctored’ दिखाते हैं तब धीरे-धीरे इन ट्रोल की बातें सही लगने लगती हैं.

आप भले ये कहें नहीं पर आपको ये तो पता है न राजदीप सर कि मीडिया में पिछले कुछ सालों में सेलेक्टिव आउटरेज बहुत बढ़ा है, और इसके कारण क्या हैं ये आप लोग ज्यादा बेहतर जान सकते हैं. एक बार सोचियेगा कि कहीं आप भी तो जाने अनजाने में सेलेक्टिव आउटरेज तो नहीं कर रहे जिससे कि इतने ज्यादा लोग नाराज़ हैं. मेरा मानना है कि इस सेलेक्टिव आउटरेज ने मीडिया के खिलाफ बहुत से लोगों को खड़ा किया है जो निष्पक्ष ख़बरें देखना चाहते थे और मैं भी उनमें से एक हूँ.

इस बार देश ने नरेन्द्रमोदी को वोट दिया है, मैंने भी. हमने नरेन्द्र मोदी को वोट हमारे विकास के लिए दिया है न कि हिन्दू राष्ट्र के लिए. इसलिए इन झंडे वाले ट्रोल को समर्थन कोई नहीं देना चाहता. मेरे जैसे लोग चाहते हैं कि आप सरकार की अच्छी और बुरी दोनों ख़बरें दिखाइए ताकि हम एक सही निर्णय ले सकें. आप हमें विपक्ष की भी अच्छी और गन्दी दोनों बातें दिखाइए ताकि हमें सच्चाई पता लगे. अगले चुनाव पर दोनों से हिसाब किताब करने को सच्ची ऑडिट रिपोर्ट तो आप लोगों से मिलनी चाहिए न? इतनी उम्मीद गलत है क्या?


जब JNU मुद्दा चल रहा था तो आप लोगों का वर्ग हमें मजबूर कर रहा था ये मानने के लिए कि ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ का नारा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है वहीँ दूसरा वर्ग चाहता था कि हम ये मान लें जो ‘कश्मीर में समस्या’ की बात करे वो पाकिस्तानी. अरे सर, आप लोगों का काम खबर दिखाना है बिना अपनी लाग लपेट के. आप वो दिखाओ न, हम पढ़े लिखे हैं हम तय कर लेंगे कि क्या सही गलत. आप क्यों हमें सिखा रहे हो?

जब एक पत्रकार अपने प्रोफेशन में अपनी विचारधारा को घुसा देता है और ख़बरें उस हिसाब से ‘बनाने’ लगता है तो दरअसल वो हमारी सोच बनाना नहीं बल्कि उस पर हमला करना चाहता है. ठीक यही चीज तो भगवा झंडे और हिन्दू राष्ट्र वाले ट्रोल फोटोशोप और फर्जी मेसेज से करते हैं. आप दोनों में फर्क क्या है? वो चाहते हैं हम भगवा सोचें, कुछ पत्रकार चाहते हैं कि हम भगवा छोड़ कुछ उनकी पसंद का रंग सोचें. सर, कोई साड़ी की दुकान थोड़ी है कि आप सब हमें अपने रंग के झंडे में लपेटना चाहते हैं.

टेक्नोलॉजी का दौर है सर, जब हमारी एकमात्र उम्मीद मीडिया हमें सेलेक्टिव ख़बरें दिखाने लगती हैं तो हम लोगों को 2 मिनट में पता लग जाता है. बस यही से इन झंडे वाले ट्रोल के साथ आम हिन्दुस्तानी भी ट्रोल बन जाते है. सर, हम जैसे आम लोग साल में 15% इन्क्रीमेंट चाहते हैं, महंगाई कम चाहते है, सड़क पर बिना किसी डर के सुकून से चलना चाहते हैं. हम न भगवा सोचना चाहते हैं, न हरा और न लाल. हम सिर्फ तरक्की और सुकून सोचना चाहते हैं.

मेरे लिए आतंकवाद सिर्फ आतंकवाद है सर चाहे मालेगांव हो, समझौता एक्सप्रेस या मुंबई. आपकी fraternity मुझे एक बार ये समझाए कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता और दूसरी बार समझाए कि हिन्दू आतंकवाद होता है तो कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ लगती है. आप लोग मेरे इमोशन से खेल रहे हैं सर. आप सीनियर हैं मीडिया में. आप अपने साथियों को रास्ता दिखा सकते हैं और समझा सकते हैं कि हम आम हिन्दुस्तानियों को आम हिन्दुतानी रहने दे हमें धीरे-धीरे आम हिन्दू न बनाये. हमें बांटने का काम नेताओं के लिए छोड़ दे क्योंकि जिसका काम उसी को साजे, और मीडिया सिर्फ हमें एक होना सिखाये.

आप थोड़ा विश्राम करके ट्विटर पर वापस आइये और झंडे वालों को दूर भगा के एक बार आम हिन्दुस्तानी के लिए ख़बरें दिखा दीजिये. जाते जाते एक बात और – भारत माता की जय. (courtesy: khabarlive)

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